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घाटी के वासी …………Lalit Hinrek

ओ घाटी के वासी ,

यहॉ नदियॉ बहती है , कोयल गाती है

हवाऐं स्वच्छ प्राणवायु लाती है

रंगीन ऑसमा है , रवि की किरणें ऊर्जा देती है

किन्तु ,

यह मानवता कि दुर्बलता है कि वह मजबूर हुआ है ,

समझा ना प्रकृति को उसने व सुख से दूर हुआ है ।

फिर छोड़ दिया नदि नालों को ,

गॉव और तालाबों को

और पहुँच गया फिर शहरों तक ,

खोजता वह भोजन को ।

यहॉ भागदौड़ जीवनशैली को भरपूर जीया उसने ,

पॉचसितारा रौनक मे भी फीकापन महसूस किया उसने ।

मानवता , हमदर्दी को यहॉ सिमटते देखा है ,

मतलब व चालबाजी को यहॉ साथ लिपटते देखा है ।

वाहनों की धूं धूं ने प्राणवायु को विरल किया ,

बिल्डिंग के जालो ने पेड़ो से महरूम किया ।

ना रवि कि किरणे , ना स्वच्छ गगन

कभी विकराल धुंध , कभी धुंऑ धुऑ ।

किन्तु ,

ओ घाटी के वासी ,

Tons valley

यहॉ तो नदियॉ बहती है , कोयल गाती है ,

हवाऐं स्वच्छ प्राणवायु लाती है ,

रंगीन ऑसमा है , रवि की किरऩे ऊर्जा देती है ।

ओ घाटी के वासी ,

यहॉ नदियॉ बहती है ,कोयल गाती है ।

By The Lost Monk

Writer || Poet || Explorer || Photographer || Engineer || Corporate Investigator || Motivator

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