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प्रकृति की पुकार

बर्फ़ से ढकी चादरों से सुसज्जित पहाड़

ग्लेशियरों से निकलती स्वच्छ नदियाँ

घनें जंगलों में गूंजती परिंदों की ध्वनियॉ

हरे हरे खेतों में झुकी हुयी धान की बालियॉ

गौशालों में छोटे छोटे बछड़े और मेमने की पुकार

तुम्हे बुला रही है

आ अब लौट चलें

ऐक कुल्हाड़ी और लकड़ियों के बंडल

पीठ पर बंधा घास और पत्तियों का बोझा

भेड़ बकरियों के चरते झुण्ड

पत्थर की स्लेटी छतें और गारे से लीपी दिवारे

घनघोर बादलों से ओझल होता सुरज

तुम्हे बुला रहा है

आ अब लौट चलें

उल्लास त्योहारों का और मृदु बोली

टोपी , बूट और ऊनों की चोली

कड़क ठंड में सुखाया मॉस और मदिरा

काली मडंवे की रोटी और लाल चावल

दूर दूर तक फैले देवदार की ख़ुशबू

विचरते काकढ और घोरल

खेतों में गिराये गये गोबरों के ढाँचें

घरों में भरे गये अनाजों के साँचे

तुम्हे बुला रहे हैं

आ अब लौट चलें

प्रकृति पहाड़ों की

सूने ऑगन , सूने खेत खलियान

भड़कती जंगल की आग और विलाप करती प्रकृति

कहती मातृ भावना तन्हाई में

आ अब लौट चलें

जिन्दा कर दे उन सब गडरियों की उम्मीदें

जिन्होंने जंगल और ज़मीन को पूजा

और जिन्दा रखा हर आने वाली विपदा मे भी

तुम्हें बुला रही है

आ अब लौट चलें ।

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मन के भीतर

दुख: की काली घटाएँ बहुत घनघोर हुयी है

हे रक्षक ! तुम जागो अब तो भोर हुयी है

मन के भीतर भाव भँवर क्यों अभिभूत हुऐ है

किस वेदना की पीड़ाओं मे ये क्षीण हुऐ है

दुख: की काली घटाएँ बहुत घनघोर हुयी है

हे रक्षक ! तुम जागो अब तो भोर हुयी है

तुम कुम्हार बनो अपनी क़िस्मत की मिट्टी के

तुम जौहरी बनो रत्नों के पारख बन कर

हे रक्षक ! श्रम की ऑच में जल भुनकर

तुम रौशनी बनो राहगीरों की मशाल बनकर

मन के भीतर भाव भँवर क्यों अभिभूत हुऐ है

किस वेदना की पीड़ाओं मे ये क्षीण हुऐ है

हे रक्षक ! अब तो जागो भोर हुयी है

हे रक्षक ! कुछ बीज बनो करूणा के तुम

जिसके अंकुर पनपे तो फूटे प्रेम हरियाली

जो तृप्त करे सूखती धरा की उर्वरता

जो असंगत कोटी मे समता का स्वर फूंके

मन के भीतर भाव भँवर क्यों अभिभूत हुऐ है

किस वेदना की पीड़ाओं मे ये क्षीण हुऐ है

हे रक्षक !

तुम निश्छल विद्रोही बन कर बिगुल बजा दो

तुम जनसेवक बनकर इंक़लाब कर दो

तुम कलम उठाकर उसे हथियार बना दो

तुम हर ख़्वाब को हक़ीक़त में साकार कर दो

दुख: की काली घटाएँ बहुत घनघोर हुयी है

हे रक्षक ! तुम जागो अब तो भोर हुयी है

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इंतज़ार

तू रोज़ रोज़ मेरे ख़्वाब बनकर आ

कभी फूलो की ख़ुशबू बनकर आ

कभी अन्न की मिठास बनकर आ

कभी अंबर में मेघ गर्जना होकर

मेरी ऑखो की बारिश बनकर आ

तू रोज़ रोज़ मेरे ख़्वाब बनकर आ

मेरे नयनों मे तो प्रेम गुलज़ार है

तू किसी पुष्प का जीवन बनकर आ

ना चाहूँ प्राणों की जुगलबंदी

तू चाहे तो विरह वेदना बन कर आ

अगर तू चाहें उत्कर्ष मेरे जीवन का

तू कोई प्रेरक प्रसंग बन कर के आ

तू रोज़ रोज़ मेरे ख़्वाब बनकर आ

मेरे नयनो में तो प्रेम गुलज़ार है , तू किसी पुष्प का जीवन बन कर आ 🌸

इस लोभ मैं न जिऊँ जन्म जन्मांतर

तू कोई सहज विचार बन कर के आ

मैं रहूँ परिलक्षित वसुधा से व्योम तक

तू कोई पुलकित स्पर्श बन कर के आ

तू रोज़ रोज़ मेरे ख़्वाब बनकर आ

तू रोज़ रोज़ मेरे ख़्वाब बनकर आ

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दरिया (EP-1)

If you find my stories dirty , the society you are living in is dirty ~ Munto

कई कहानियाँ दिल को छू जाती है । क्या पता यह आपके दिल को छू जाऐ । यह कहानी मेरे मित्र द्वारा सुनायी गयी जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है । ये कहानी है रिश्तों की , मोहब्बत की , ख़ुशी की और ज़िन्दगी के मायनों की ।

कहानी शुरू करते है मेरा नाम सागर है । मेरे पूर्वज कुमाऊँ हिमालय के अल्मोडा ज़िले के बाशिंदे थे जो रोज़ी रोटी की तलाश मे 1978 मे मुंम्बई आ गये थे । मैं उस वक़्त मात्र 5 साल का था । मेरे पिता के साथ साथ मेरी मॉ , मेरी बहन , मेरे चाचा चाची और उनके दो बच्चे भी साथ आये थे । गॉव मे सिर्फ़ मेरे दादा दादी ही बचे थे जो गॉव मे हम लोगों की ज़मीन जायदाद का ख्याल रखते थे । मेरे पिता ऐक होटल मे कार्य करते थे और हम लोग ऐक छोटे से मकान मे ऐक साथ रहते थे । शुरूवात के दिनों मे हम लोग साथ रहते थे लेकिन चाचा की ऐक मैनुफ़ैक्चरिंग कंपनी मे नौकरी लगने के बाद दोनों परिवार अलग अलग रहने लगे । मेरे पिता बेहद मेहनती व्यक्ति थे और पॉच – छ साल के अन्दर ही हम लोग अंधेरी में ऐक फ़्लैट में शिफ़्ट हो गये ।

मेरे पिता का नाम बलबीर सिहं था और प्यार से उन्हें बॉबी कहते थे । मेरी मॉ शकुन्तला घरेलू महिला थी जो पूजा पाठ इत्यादि में लीन रहती थी । मेरी बहन कंचन मुझसे तीन साल छोटी है ।

मेरे चाचा सतबीर सिंह मार्केटिंग मैनेजर थे और धीरे धीरे उन्होंने अच्छी तरक़्क़ी कर ली थी । हमारे दोनों परिवार आस पास ही रहते थे और प्रत्येक दिन ऐक दुसरे के यहॉ जाना लगा रहता था । मेरा चचेरा भाई मयंक है जो मुझसे ऐक साल छोटा है लेकिन हम लोग ऐक साथ ही स्कूल में भर्ती हुये थे तो हम भाई होने के साथ साथ अच्छे दोस्त भी थे । मेरी चचेरी बहन जान्वही है जो मुझसे छ साल छोटी है ।

शुरूवात के सालों में हम लोग प्रत्येक वर्ष ऐक बार तो गॉव जाते थे और गर्मियों की छुट्टियों में कम से कम ऐक महिना ज़रूर बिताते थे । मेरे दादा जयसिहं और दादी शारदा देवी हमारे लिये तरह तरह के पहाड़ी पकवान बनाते थे और ढेर सारे फल इत्यादि खाने को देते थे । लेकिन हमारी दसवीं के बाद से चीजें बदलने लगी । बोर्ड के ऐक्जाम थे मेरे पिता ऐवम् चाचा दोनों हमारी पढ़ाई को लेकर बेहद सीरियस थे इसलिये पूरे साल मेरी और मयंक की ट्यूशन लगवाई गयी ताकि हम अच्छा स्कोर कर सके । हम पढ़ने में अच्छे थे और स्कूल के अच्छे बच्चों में हमारी गिनती होती थी । मैं गणित में बेहद लोकप्रिय था और मैंने मैथ्स ओलम्पीयाड में ब्रॉन्ज़ मेडल भी लिया था । मेरे पिता को मुझसे बेहद उम्मीद थी और मैं भी आदर्श बेटा होने के नाते उन्हें निराश नहीं करना चाहता था । मैंने बहुत मेहनत की और बोर्ड में 91% अंक प्राप्त किये । मंयक के भी 87% अकं आये तब पहली बार चाचा को निराश देखा की मंयक के मुझसे कम नम्बर आये है ।

ख़ैर मैं और मंयक ना सिर्फ़ भाई थे लेकिन भाईयों के भी भाई थे । कहीं भी कोई बात हो जाये हम ऐक दुसरे का साथ कभी नहीं छोड़ते थे । कोई भी बात छुपानी हो या कभी भी ऐक दुसरे का साथ देना हो हम कभी पीछे नहीं हटते थे ।

उस साल गॉव नहीं जा पाये । रिज़ल्ट के बाद से ही घर वाले डिस्कशन में लगे रहते कि हमें कौन सा स्कूल और कौन सा कोर्स करवाना है । छुट्टियों के दिनों में हमारी अंग्रेज़ी की ट्यूशन लगवाई गयी ताकि हम लोगों के कम्यूनिकेशन स्किल अच्छे हो जाये । तीन महीने तक अंग्रेज़ी सीखी और पता भी नहीं चला कब टाइम निकल गया । सुबह हम लोग क्रिकेट एकेडमी जाते और शाम को ट्यूशन । यही रूटीन था वक़्त कैसे निकल गया पता ही नहीं चला । दादा दादी से फ़ोन पे बात होती थी । वो लोग बहुत मिस करते थे । कई बार दादी इमोशनल होकर कहती थी कि मरने से पहले ऐक बार देखना चाहती हूँ तो बहुत बुरा लगता था । मैंने पिता जी को कहा था की दादा दादी को मुंबई बुला लो लेकिन वो मुंबई नहीं आना चाहते थे वो कहते थे कि वो अपना बुढ़ापा पहाड़ों में काटना चाहते है ।

दादाजी फ़ौज से रिटायर्ड थे उन्हे पैंशन मिलती थी तो घर का खर्चा आराम से चल जाता था । लेकिन बुढ़ापे की वजह से वो ज़्यादा काम नहीं कर पाते थे । मुझसे कहते रहते थे की ज़मीन बंजर होते जा रही है इसका उन्हें बेहद दुख है ।

फिर बस फ़ोन में बातचीत होती रहती थी । मुझे कॉमर्स में ऐडमिशन लेना था और मंयक को साइंस में । हमारे मार्क्स अच्छे थे तो दोनों को ऐडमिश्न मिल गया ।

परिवार बेहद खुश था । हमने सबने मिलकर ऐक पार्टी रखी थी जिसमें हम लोगों ने खूब डॉन्स किया । वो दिन भी खुबसूरत दिन थे जिसमें मॉ बाप बस हमारे पास होने पर गर्व करते थे ।

अगले साल ग्याहरवीं के ऐग्जाम के बाद हम लोग गॉव गये । दो सालों में कितना कुछ बदल गया । दादा और दादी ऐक दम बूढ़े लगने लगे थे । सफ़ेद बाल और झुर्रियों वाला चेहरा , चलने में लड़खड़ाहट और बोलने में रूकावट । ऐकदफा मैं हैरान हो गया कि क्या यही वो दादा दादी है जो बचपन में मुझे उठा उठा के घुमाते थे लेकिन आज चल भी नहीं पा रहे । मैं इंमोशनल हो गया और अंदर ही अंदर मुझे बुरा लग रहा था । दादा जी ऐक दिन शाम को मुझे और मंयक को साथ ले गये और हमारी ज़मीन जायदाद दिखाने लगे । दादा जी कह रहे थे की यदि तुम लोग इतनी ज़मीन में मेहनत करोगे तो तुम्हें कहीं भागने की ज़रूरत नहीं । लेकिन खेती में कुछ रहा नहीं आजकल , लोग खेती को बढ़ावा नहीं देते है और इससे दूर भागते है । तुम लोग ऐसा मत करना और अपने पूर्वजों की विरासत को खो मत देना । उस दादा ने रात को अपने दादा की कहानी सुनाई ।

कहानी गडरियों की जो साल भर अपनी भैड़ बकरियों और भैंसों के झुण्डों के साथ रहते थे । दादाजी कहते थे की उनके दादा धनसिंह इलाक़े के सबसे बड़े गडरियों में से ऐक थे । दादा कहते थे कि उनके भी दादा ने हिमालय बहुत सी यात्रायें की थी । कई दफ़ा उनका पाला हिमालय में रहने वाली कई प्रकार की जनजातियों से हुआ था जो तंत्र मंत्र व जादू टोना से इंसान को बकरी बना सकते थे । वे जातियाँ आज भी हिमालय के कई इलाक़ों में मौजूद है । ये कहानियाँ बेहद रोमांचक होती थी । दादा कहते ऐक वक़्त उनके दादा के पास 2000 भैड़ बकरियाँ थी और उनका परिवार इलाक़े के सबसे रसूखदार ख़ानदानों में ऐक था । लेकिन ज़माना बदलता गया और व्यावसायिक दृष्टिकोण भी बदल गया । अब लोग पढ़ लिखकर टैकनिकल होते जा रहे है और अपनी विरासत को भूलते जा रहे है । दादा जी चाहते थे मैं और मंयक अपनी विरासत को ज़िन्दा रखे लेकिन आज के दौर में यह संभव नहीं था । उन्हें भी पता था कि वो हमें अपने पास रखना चाहते थे लेकिन गॉव लगभग विरान ही हो चुके थे और लोग सिर्फ़ छुट्टियों के समय ही दिखाई देते थे । वहॉ ना अच्छी रोड थी , ना अस्पताल था और न ही अच्छे स्कूल थे ।

ख़ैर छुट्टियाँ ख़त्म होने के बाद हम लोग गॉव से निकल रहे थे । दादा ने मुझे और मंयक को हज़ार- हज़ार रूपये दिये जिसके बारे में हमने घर में कभी भी ज़िक्र नहीं किया और उसके खूब मज़े किये । हम लोग मोहल्ले में क्रिकेट टीम बनाते थे जिसमें पचास – पचास रूपये का मैच चलता था । मेरी और मंयक की टीम होती थी और हम हमेशा जीतते थे । पचास रूपये जितने से ऐसा लगता था जैसे हम किसी रईसज़ादे से कम नहीं । फिर उसके बाद फिर से बोर्ड ऐग्जाम आने को थे । इसी बीच दादा और दादी की तबीयत ख़राब हो गयी । गॉव से बुलावा आया । मेरे पिता और चाचा दोनों गॉव चले गये लेकिन हम लोग नहीं जा पाये क्योंकि बोर्ड ऐग्जाम थे । मैं उनसे आख़िरी बार मिलना चाहता था । लगभग एक माह तक दोनों अस्पताल में रहे । पहले दादी की मृत्यु हो गयी और फिर ऐक हफ़्ते के बाद दादा की मृत्यु हो गयी । यह बिल्कुल सपने की तरह लगता है । दोनों अब हमारे साथ नहीं है मैं सोलह साल का था और मंयक पन्द्रह साल का । दादा कहते थे

“सागर और मंयक , खूब मेहनत करना और तरक़्क़ी करना । अपने पूर्वजों को याद करना और उनकी विरासत को जिन्दा रखना । हमें मालूम है तुम अच्छा काम करोगे और हमारे बाप दादाओं के बाप दादा स्वर्ग के द्वार से देख रहे होगें । उन्हें भी तुम पर गर्व होगा ।हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है ।”

जैसे ही मालूम पड़ा कि दादा दादी नहीं रहे , यह मालूम नही था कि कैसा अनुभव है बस रोना आ रहा था । मैंने उस रात खाना नहीं खाया । मंयक भी मेरे साथ था । कंचन भी भूखी सो गयी और जान्वही भी ।

उस दिन चीख चीख कर कहने का मन था । दादी मॉ और दादा जी हम आपसे बेहद मोहब्बत करते हैं लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि अन्तिम समय में हम आपके साथ नहीं थे । कुछ दिन के बाद फिर से सब चीज़ें सामान्य हो गयी । हम लोग बोर्ड ऐग्जाम की तैय्यारियॉ करने लगे ।

बोर्ड ऐग्जाम अच्छे हो गये रिज़ल्ट भी शानदार आया था । ऐग्जाम के बाद ही हम लोगों की कोचिगं स्टार्ट हो गयी थी । अब कॉम्पिटशन की तैयारी थी । मयंक इंजीनीयरिंग के लिये और मुझे कॉमर्स /बी०बी०ऐ के लिये तैयारी करनी थी । मैंने मुंम्बई यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी के लिये ऐप्लाई किया था और मयंक ने भी चार पॉच ऐग्जाम दिये थे । अब घरवाले को आगे की चिंता थी कि कौन सा कॉलेज मिलेगा और कौन सा कोर्स करेगे । मयंक को नामी इंजीनियरिंग कॉलेज मे कम्प्यूटर साइंस में ऐडमिशन मिल गया । मेरा रिटन ऐग्जाम अच्छा हुआ था बस रिज्लट आना बाकि था । मेरे पिता चाहते थे कि मैं सैंट जेविर्स कॉलेज (St Xavier’s College) में भर्ती हो जाऊँ लेकिन वह रिज़ल्ट पर निर्भर करता । कुछ दिन बाद रिज़ल्ट आ गया और मुझे बी० बी० ऐ० (BBA) के लिये सेंट जेविर्स कॉलेज मिल गया ।

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पप्पू भाई (राजनीती , व्यवस्था ऐवम जनता ) by Lalit Hinrek

इक छोटी सी बस्ती मे रहता था पप्पू भाई

रंग बिरंगा छोटा व मोटा था पप्पू भाई

ना पड़ता था , ना लिखता था

बस लड़ना उसका शौक़ था

बस्ती मे हाहाकार मची थी

पप्पू का ख़ौफ़ था ….।।

बीत गया पप्पू का बचपन

अब वो बड़ा हुआ

निकम्मा बेकार , और निहायती

आवारा पड़ा हुआ ।।

दिन भर पप्पू तास खेलता

ना पॉव पे खड़ा हुआ

गुचडूम खाता , क़ब्ज़ी हो गयी

पादता सड़ा हुआ ।।

बड़ा हो गया पप्पू भाई

अब शादी की बारी आयी

पप्पू डर गया अब उसकी

बर्बादी की बारी आयी

शादी हो गयी पप्पू की

घर आ गयी लाड़ों रानी

ज़ीरो फ़िगर की सुन्दर बाला

शीला की थी जवानी

कुछ दिन तो ऐसे ही चल गये

मस्ती मस्ती मे ही टल गये

पर पप्पू धीरे से ग़रीब हो गया

दुख दर्द उसका नसीब हो गया

क़िस्मत से लाचार हो गया

टुकड़ों मे वह चार गया

पर ये क्या चमत्कार हो गया

पप्पू का बेड़ा पार हो गया

पप्पू के सपने मे लक्ष्मी मॉ आयी

ख़ुशियों की बौछार व रंग हजारो लाई

पप्पू भाई मैदान मे चुनाव लड़ने के इरादे से

बस्ती को चमकाऐंगे और विकास के वादे से

पप्पू घर घर जाने लग गया

लोगों को मनाने लग गया

कुछ जन को बहलाने लग गया

कुछ को वो फुसलाने लग गया

सज्जनों को धमकाने लग गया

सज्जन हारे पप्पू जीता

क्योंकि वो था बस्ती का चीता

आज पप्पू ने शपथ ली

अपने हाथो मे ले कर गीता

वादा कर गये पप्पू भाई कि सबका काम करेंगे

बस्ती को चमकायेगे और देश का नाम करेंगे

किसे पता था पप्पू भाई बस आराम करेंगे

निचोड़ देंगे सिस्टम को व काम तमाम करेंगे

फिर घर से पप्पू जी का बंगला हो गया

आम जन इस खेल मे कँगला हो गया

फिर पप्पू की कार आयी

इटैलियन मार्बल दिवार आयी

छोटा पप्पू आया तो ख़ुशियाँ हज़ार आयी

पप्पू के घर मे तो बेमौसम बहार आयी

कितना खुश है पप्पू आज

अपनी छोटी सी लाईफ से

ऐक ओर घोटालों का राजा

और शीला जैसी वाईफ से

पड़ने वाले बचपन के चिरकुट

आज कितने दुखी है

आपस मे वो बातें करते

पप्पू कितना सुखी है ।

पप्पू और भी मोटा हो गया

खाकर ख़ूब जनता का का पैसा

लूट खसोट मची यहॉ पे

इसमें किसी का विरोध कैसा ?

जब तक ऐसी जनता होगी

और ऐसी सरकार होगी

तब तक ना सिस्टम बदलेगा

हर पप्पू की नैय्या पार होगी

उसके अपने बंगले होगे

BMW कार होगी

पड़ने वाले हर चिरकुट की

इज़्ज़त तार तार होगी ……।।

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Motivation

तिनके

ये कहानी कुछ अपने बारे मे लिख रहा हूँ । हॉलाकि यह कठिन है लेकिन यादों के झरोखों से तिनको को पिरोना और ताना बाना बुनकर उस हक़ीक़त को कहानी मे जिन्दा करना किसी भी रोमांच से कम नही । यह तुम्हारी स्मृति मे कहीं ना कहीं ताउम्र जिन्दा रहती है । इसलिये भी लिख रहा हूँ कि शायद इन परिस्थितियों मे लिखने से बेहतर अवसर हो ही नही सकता । कुछ और कारण भी है जैसे मेरे जीवन के बहुत पहलुओं से जो ना रूबरू हो सके , उन्हें भी अपनी उस कहानी तक पहुँचाना । जिससे न सिर्फ़ मे आने वाले वक़्त मे आपके ज़ेहन मे जिन्दा रहूँ बल्कि विचारों मे भी निरन्तर प्रवाहित होता रहूँ ।

मैं बचपन से ही जिझासु प्रवृति का व्यक्ति रहा हूँ । मेरे जीवन के उतार चढ़ाव किसी roller coasters (तीव्र गती से बहती लहरे) से कम नही रहे । स्कूल मे पढ़ाई मे बहुत अच्छा रहा लेकिन फिर कॉलेज आते ही नयी परिस्थितियों के अनुरूप ढल न सका और परिणाम स्वरूप B.Sc और Engineering Entrance मे फ़ेल हो गया । यह वास्तव मे झकझोर देने वाली घटना थी जिसने मुझे अन्दर से तोड़ दिया और आत्मग्लानि के अनुभव ने शायद निराशा के नये दामन को जन्म दिया । मेरे पिता जिन्होंने मुझे पढ़ाने के लिये ज़मीन तक बेच दी थी वह मुझसे कितनी उम्मीद करते थे यह बात मुझे अन्दर ही अन्दर खोखला कर रही थी । उस वक़्त शायद मुझे समझ नही थी की मैंटल हेल्थ क्या होती है लेकिन यह वास्तव मे nervous breakdown था लेकिन हम लोग ऐसे माहौल से आते है जहॉ इस बारे मे कोई बात नही की जाती । कितने ऐसे बच्चे है जो कठिन दौर से गुजरते है फिर हार मान जाते है । मुझे भी समझाने वाला कोई नही था और मैं किसी से भी अपनी भावनाऐं साझा नही कर सकता था । ऐक बार ऐसा लगा की कैसे लोगों का सामना किया जायेगा । यह सब कुछ ऐक अलग अनुभव था । जो कल तक समझते थे कि मैं अपने गॉव का सबसे होनहार लड़कों मे ऐक था वो लोग बातें बनाने लग गये थे कि मैं बर्बाद हो चुका हूँ ।

फिर गॉव वापस गया , घर परिवार का सामना करना किसी जंग से कम नही था । जब आप निराश होते हो तो आपको वास्तव मे चाहने वाले लोग भी दुखी होते है । यह इस प्रकार का जुड़ाव होता है जो सभी लोगों को प्रभावित करता है । सभी को मालूम था कि मैं निराश हूँ इसलिये मुझे किसी ने कुछ नही कहा लेकिन मुझे मालूम था कि सब कितने दुखी है । कई दफ़ा जीवन मे कुछ समझने और समझाने के लिये शब्दों की ज़रूरत नही होती । आपकी नम ऑंखें , आपकी शक्ल और सूरत सब ब्यॉ करती है ।फैल होना वास्तव मे बेहद निराशाजनक है । यह अनुभव जीवन के कटु अनुभवों मे से ऐक था ।

जुलाई 2007 की बात है मैं शाम के वक़्त छत पर बैठा था । मेरे पिता मेरे पास आये और उन्होंने कुछ ऐसे कहा कि जिसने मुझे हौसला दिया और मुझे वापस बदलाव की प्रेरणा दी

मेरे पिता बोले, “ बेटा ऐक बात समझनी चाहिये कि जैसे जैसे हमारी उम्र बड़ रही है हमारी काम करने की क्षमता कम हो रही है लेकिन जैसे जैसे तुम्हारी उम्र बढ़ रही है तुम्हारी काम करने की ताक़त बड़ रही है तो तुमको इतनी मेहनत करनी चाहिये की तुम्हें कभी असफलता का सामना ही न करना पड़े । बाकि हम बिल्कुल दुखी नही है यह सब तुम्हारे लिये ही तो है चाहे सारी ज़मीन बेचनी पड़ेगी लेकिन तुम लोगों की पढ़ाई मे कोई कमी नही होगी”

मैं वास्तव मे निःशब्द था , ऑखो मे ऑसू थे और हृदय मे आत्मग्लानि , लेकिन फिर उस रात सोया नही और पिता जी के शब्द ब शब्द डायरी मे लिख डाले । ऐक बात पहले से मैं समझता था कि आप जीवन मे अच्छा करेंगे तो भी समाज मे बहुत लोग आपको नापसन्द करेगें और अगर जीवन मे असफल रहोगे तो भी समाज मे काफ़ी लोग आपकी निन्दा करेंगे । इसलिये समाज मे लोगों के नज़रिये को उस उम्र मे छोड़ दिया था । मैं यह बात समझता था की जीवन मे Self motivated (आत्म प्रोत्साहन) और Ambitious (महत्वाकांक्षी) होना बेहद आवश्यक है । मैने निर्णय लिया कि अब साल भर घर नही आऊँगा । फिर देहरादून आ गया और पूरे ऐक साल तक घर नही गया । हमारा परिवार आर्थिक परिस्थितियों से जूझ रहा था यह वो समय था जिसे शायद शब्दों मे ब्यॉ करना मुश्किल है ।

यह सब मैं संजोये रखना चाहता हूँ इसलिये ताकि सनद रहे कि वक़्त की फ़ेहरिस्तों ने कई जमाने बदल डाले है ।बहुत से ऐसे युवा साथी भी होगे जो जीवन मे अभी कठिन दौर से गुजर रहे है लेकिन मैं आपको यक़ीन दिलाता हूँ यह सब कठिन दौर आपके जीवन के सबसे क़ीमती वक्त मे से ऐक होगा । इस दौर से जो से जो व्यक्तित्व निर्माण होगा वह शायद बेशक़ीमती है । मैं जीवन के उस दौर का ऐक वाक्या साझा कर रहा हूँ । यह वाक्या है आस्था का , मोहब्बत का , परिवार का और प्रेरणा का । कभी किसी के साथ साझा करने का अवसर नही मिला या ये कहूँ कोई इतना सौभाग्यशाली नही रहा शायद लेकिन यह आपको समर्पित करना चाहता हूँ ताकि जब तक ये ब्लॉग रहे तब तक यह कहानी मे जिन्दा रहे , हमेशा हमेशा के लिये ।

हमारी पढ़ाई मे जीतना योगदान हमारी दीदी का है उतना शायद किसी का भी नही है । उसने 1000 रूपये मे स्कूल मे नौकरी की है और हर महीने रूपया रूपया जोड़कर हमारी पढ़ाई को खर्चा भेजा । यह कल्पना भी करना मुश्किल है कि हम कैसा महसूस करते थे । बहुत कम ही लोग जानते है कि इस ख़ुशनुमा हृदय के अन्दर कितना मर्म दफ़्न है । मैं इसे अपने जीवन के बेशक़ीमती चीजो मे शुमार करता हूँ ।

देहरादून आने के बाद मैं , मेरा छोटा भाई ऐवम मेरा मित्र संजय हम साथ रहते थे । हम बहुत मेहनत करते थे और शायद यह वो साल था जब हमने हर दिन 8-10 घण्टे पढ़ाई की होगी । मेरे पास 2007 की डायरी लिखी है जिसमें मैं सोने से पहले रोज अपनी दिनचर्याओं का ब्योरा लिखता था । आज जब उसे खोलकर देखता हूँ तो वास्तव मे यक़ीन नही होता की हमने कितनी मेहनत की थी ।

Diary of 2007

इसके अलावा दीदी हर महीने लैटर लिखती थी जब भी किसी के पास पैसे भिजवाया करती तो साथ मे ऐक लैटर भी भेजती थी । यह बेहद पर्सनल है लेकिन मैं इसे अपने ब्लॉग मे साझा कर रहा हूँ ताकि जब भी मैं इसे देखूँ उन लम्हो को फिर से जी सकूँ । मेरे बाद भी सालो सालो तक यह कहानी जिन्दा रहे । ज़िन्दगी के उन पहलुओं को लिखना जिसे सिर्फ़ आपने जीया है वास्तव मे कठिन है । बहुत सी कहानियाँ होती है जो प्रेरणा देती है , जीने की उम्मीद देती है और सपने देखना सिखाती है । यह भी कुछ इस प्रकार से है जिसने उम्मीदों मे जीना सिखाया, आने वाले वक़्त के लिये प्रेरणा दी ।

सितम्बर 2007 मे दीदी का ऐक लैटर आया जिसमें लिखा था

“प्रिय भैय्या ललित

सदा खुश रहो । आशा करती हूँ कि तुम उस शुभ स्थान पर भगवान ऐवम् महासू देवता की कृपा से ठीक होगें । हम सब भी ठीक है । आगे समाचार इस प्रकार से है कि विक्की घर आ गया है और तुम्हारी चिट्टी भी मिल गयी है , मैने उसे पढ़ भी लिया है ।

भैय्या , चिट्टी भिजवाते रहना ।मुझे तो ऐसा लगता है कि हमारे पास कुछ भी नही है । मुझे मणी तो मिली थी लेकिन जब विक्की घर आया तो पापा और ने देखा कि उस डिब्बी मे तो कुछ भी नही था । जब मैं स्कूल से 3 बजे घर आयी तो विक्की को देखा तो ख़ुशी हुई लेकिन विक्की खुश नही था कह रहा था कि तुम झूठ बोल रहे हो तुम्हें कुछ नही मिला था ।

भैय्या कभी कभी तो मर जाने का मन करता है कि लगता है अब हम दुख नही झेल सकते , सारी ताक़त ख़त्म हो चुकी है । उस डिब्बी मे चॉदी के दो सिक्के भी थे जब देखा तो वो भी नही थे । भैय्या भगवान ने जो भी दिया था वह भी छीन लिया ।

पापा मम्मी और विक्की तुम्हें यह सच नही बताना चाह रहे थे लेकिन भैय्या मैं तुम्हें कभी भी झूठ नही बोलना चाहती हूँ । हमारे पास ख़ाली विश्वास बचा है ।

भैय्या मुझे स्कूल से 1000 रूपये मिले मैं तुम्हें ये रूपये भिजवा रही हूँ पापा के पास ऐक भी रूपया नही है । तुम्हें पता है कि मैं कमज़ोर हो रखी हूँ । भैय्या घर का खर्चा भी चलाना होता है । मेरी दवाईयॉ भी ख़त्म हो चुकी है । मैं जानती हूँ कि तुम्हें बहुत कष्ट हो रहा होगा क्योंकि बिना पैसो के कुछ भी नही होता लेकिन क्या करूँ 100 रूपये से जमा करती हूँ कभी 500 हो जाते कि तब तक कोई न कोई मुसीबत आ जाती है । दीपावली आने वाली है हमने कुछ भी नही ख़रीदा है । सोच रही थी की इस बार रंग करवा दूँ लेकिन मेरी इच्छा कभी भी पूरी नही होगी ।

भैय्या अपना भी ख्याल रखना हमारी टेंशन मत लेना । मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूँ अब जैसा तुम सोचोगे हम वैसा ही करके दिखायेंगे । अरे भगवान कब तक हमारी परीक्षा लेंगे अब हम भी परीक्षा देने के लिये खड़े । मैं सनम की भूगोल की किताब , इतिहास उत्तरांचल की किताबे पढ़ रही हूँ । भैय्या तुम्हारे पास जितना भी समय है ख़ूब पढ़ाई करना और मुझे भी चिट्टी भिजवाते रहना थोडा हौसला बजता है । जब बहुत दुख होता है तो तुम्हारी चिट्टी पढ़ लेती हूँ ।

सनम के अर्धवार्षिक परीक्षा समाप्त हो गयी है रिज़ल्ट के बाद पता चलेगा कि इसने कितनी मेहनत की है । ख़ूब पढ़ाई करती है काम भी करती है । मम्मी सुबह घास के लिये जाती है उसके बाद कुछ काम नही करती है । मैं और सनम सारा काम करते है ।

महासू देवता तुम्हारी रक्षा करेंगे । विश्वास रखना ।

भैय्या चिट्टी भिजवाना हम इन्तज़ार करेंगे ।

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आज भी जब ये चिट्ठीया खोलता हूँ तो ऑंखें नम हो जाती है । कभी किसी के साथ साझा करने का अवसर नही मिला । मेरे लिये यह उस क़ीमती उपहार से कम नही है जिसने मुझे भावनात्मक रूप से संवेदनशील बनाया है । आपके साथ साझा कर रहा हूँ क्योंकि ये सिर्फ़ कहानी नही है यह उससे बढ़कर है । ये ज़िन्दगी है जिसे मैने जीया है और ये वक़्त है जिसने हमे सिखाया है । हमारी नींवों मज़बूत बनाया की कभी किसी के प्रति घृणा , द्वेष या ईर्ष्या उत्पन्न न हो । मैं शुक्रगुज़ार हूँ हर उन छोटी छोटी बातो का जिसने जीवन को अलग रूप दिया । जीवन मे बहुत से ऐसे पहलुओं से रूबरू होना मेरी ख़ुशनसीबी है और मैं तमाम उन व्यक्तियों से ज़्यादा भाग्यशाली हूँ जिन्होंने जीवन मे कठिन दौर का सामना नही किया है । हम कितने संवेदनशील हो जाते है कि हमारे संवाद हमारी लेखनी से स्थापित होते है । ये वो दौर था जब मैं न सिर्फ़ भावनात्मक रूप से बल्कि वैचारिक रूप से भी ईश्वर के क़रीब जाना चाहता था । मैने उस वक़्त के दौर मे कुछ कविताएँ लिखी है जो मेरी प्रगाढ़ आस्था को प्रदर्शित करती है ।जब हम भयभीत होते है तो हमे भावनात्मक संवेदनशीलता को स्थिर बनाये रखने के लिये सहारे की आवश्यकता होती है । हमारे पास ऐसा कुछ भी नही था जो हमारी मज़बूती बनता सिवाय उम्मीदों के । मैने प्रार्थनाएँ की , मैने तपस्याएँ की और भक्ति की ।

उस दौर मे मुझे लगता था कि मुझसे बड़ा भक्त शायद ही इस ब्रह्माण्ड मे कोई होगा । मैने ईश्वर के साथ संवाद स्थापित किये । मैने हज़ारों प्रार्थनाऐं की और मैने कविताएँ लिखी । ये मेरे लिये क़ीमती वक़्त था मैने उस दौर मे ऐक वैचारिक संवेदना स्थापित की जिसने ज़ेहन मे हमेशा के लिये गहरा प्रभाव डाला । उस दौर की यह कविता मेरी बेहतरीन कविताओं मे से ऐक है । यह कुछ इस प्रकार से से है ।

मालिक (A letter to God by Lalit Hinrek )

तू मालिक है मेरे मौला , इस बन्दे पे रहम कर

ना समझू कि तू काफ़िरों की हुकूमत से डर गया

वो बन्दा जो आवाज़ दे , उस बन्दे पे रहम कर

ना समझू की तू काफ़िरों की हुकूमत से डर गया

अर्ज क्या करूँ कि क्या ख्याल है !

आज तक़दीर लिख दे कुछ ब्यॉ न करूँ

तू मालिक है मेरे मौला , इस बन्दे पे रहम कर

वो बन्दा !

वो बन्दा जो इस अंधेरे से डर गया

वो बन्दा !

वो बन्दा जो तेरी मोहब्बत पे लुट गया

राह देख तेरी वक़्त जाया कर गया ….वो बन्दा

उस बन्दे पे रहम कर ।

तू मालिक है मेरे मौला , इस बन्दे पे रहम कर ।

ना समझु की तू काफ़िरों की हुकूमत से डर गया ।

ना जाये इतना दूर कि तू तन्हा हो जाये

उस बन्दे की मोहब्बत को नज़रअंदाज़ न कर ।

वो बन्दा तेरा अपना है , कुछ ख्याल तो कर

यूँ काफ़िरों की हुकूमत को आबाद न कर

तू मालिक है मेरे मौला ।

अर्ज क्या करूँ कि तू क़रीब हो जाये

मिट जाये ये फ़ासले , तू नसीब हो जाये

आज तक़दीर लिख दे कुछ ब्यॉ न करूँ

तू मालिक है मेरे मौला , इस बन्दे पे रहम कर

तू मालिक है मेरे मौला , उस बन्दे पे रहम कर

ना समझु की तू काफ़िरों की हुकूमत से डर गया ।

दे हवा नम ऑखो को सुखाने मे

नफ़रत को , जलन को बुझाने मे

कर गया जो ग़लतियाँ अनजाने मे

ना दूर इतना जा मेरे मौला

कि लग जाये वक़्त लम्हा भुलाने मे

तू मालिक है मेरे मौला , इस बन्दे पे रहम कर

अर्ज क्या करूँ की तू परवाह न करे

हो गया तन्हा तो तेरा दर नज़र आया

ये मोहब्बत है मेरी , मुश्किल न समझ

यहॉ लुट गये हज़ारों तो तेरा दर नज़र आया

आज तक़दीर लिख दे , कुछ ब्यॉ न करूँ

तू मालिक है मेरे मौला , इस बन्दे पे रहम कर

ना ग़ुरूर है कोई वो बेज़ुबान है

ना शिकवा कोई वो वीरान है

ये कैसी वफ़ा का इम्तिहान है

वो बन्दा है तेरा इशारा तो कर

वो भड़के वो शाला , वो तूफ़ान है

तू मालिक है मेरे मौला , इस बन्दे पे रहम कर

ना समझू की तू काफ़िरों की हुकूमत से डर गया !!

यह प्रगाढ़ आस्था परिस्थिति जनित होती है । मुझे यह बात समझ आ गयी की यदि ईश्वर कही भी होते तो मनुष्य जीवन मे कभी दुख नही होते । मेरी हज़ारों प्रार्थनाऐं शायद अनसुनी रह गयी । धीरे धीरे यह समझ आ गया कि कर्म सर्वोच्च है । फिर कर्म को अराध्य मानता चला गया और फिर वास्तविकता को समझने की कोशिश करता रहा । यह ऐक अलग विषय है इस पर कभी फिर चर्चा करूँगा ।

लिख बहुत कुछ सकता हूँ लेकिन फिर कभी किसी और कहानी के रूप मे कुछ बाते लिखूँगा ।वो वक़्त भी चला गया और उस साल हम तीनो रूम मेट सफल होकर अपनी अपनी मंज़िलों के लिये आगे बड़ गये ।

हमारा रूम मेट संजय दिल्ली पुलिस मे दारोग़ा (Sub Inspector) भर्ती हो गया । मैं इंजीनियरिंग कॉलेज चला गया हॉलाकि जिस प्रकार से मेहनत की थी उसका 10 % भी सफल नही हो पाया । मेरा छाँटा भाई सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा करने श्रीनगर चला गया ।

आई० ऐ० ऐस० बनना चाहता था सोचा था कभी बनूँगा तो उस वक़्त की लिखी डायरी और उसमे लिखी उस दौर की बातें ऐक किताब के रूप मे लिखूँगा । लेकिन हम वक़्त की नज़ाकत को नही समझ पाते । वक्त फिर हमे उन दिशाओं मे ले जाता है जिसकी हमने कभी कल्पना भी नही की होती है । ये ऐक छोटी सी घटना है लेकिन कितनी तमाम ऐसी घटानाओ ने मेरे जीवन को पिरोया है ।

जब भी कभी लगता है कि आगे आ गया हूँ तो पीछे मुड़कर देखता हूँ , बार बार पड़ता हूँ और लिखता हूँ । जब भी लगता है कि हृदय मे नफ़रत भर रही है , पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बस मोहब्बत ही मोहब्बत दिखाई देती है । यह मेरे हृदय की सबसे कोमल पहलुओं मे से कुछ है जिसे आज आपके सामने समर्पित कर रहा हूँ । यक़ीन मानिये यह मेरी तरफ़ से दिया गया ऐक तोहफ़ा है जिससे आपके हृदय की भावनात्मक संवेदनाओं को जिन्दा करने का अवसर मिलेगा । मैं नही जानता आप कौन हो , क्या हो और कहॉ हो लेकिन यक़ीन मानिये यदि आप यह पढ़ रहे हो तो आप जो भी हो , जहॉ भी हो , मेरा हृदय आपसे बेइंतहा मोहब्बत करता है और हमेशा करता रहेगा ।

आप सभी को समर्पित

“फिर मिट जायेगी ऐक दिन हस्ती हमारी

पर याद तो करोगे मेरी क़लम की वफ़ा को

टुकड़े मत समझियेगा, मेरे दिल की आवाज़ें है

शिद्दत से सुनोगे तो समझोगे कभी”

~thelostmonk