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इंतज़ार

तू रोज़ रोज़ मेरे ख़्वाब बनकर आ

कभी फूलो की ख़ुशबू बनकर आ

कभी अन्न की मिठास बनकर आ

कभी अंबर में मेघ गर्जना होकर

मेरी ऑखो की बारिश बनकर आ

तू रोज़ रोज़ मेरे ख़्वाब बनकर आ

मेरे नयनों मे तो प्रेम गुलज़ार है

तू किसी पुष्प का जीवन बनकर आ

ना चाहूँ प्राणों की जुगलबंदी

तू चाहे तो विरह वेदना बन कर आ

अगर तू चाहें उत्कर्ष मेरे जीवन का

तू कोई प्रेरक प्रसंग बन कर के आ

तू रोज़ रोज़ मेरे ख़्वाब बनकर आ

मेरे नयनो में तो प्रेम गुलज़ार है , तू किसी पुष्प का जीवन बन कर आ 🌸

इस लोभ मैं न जिऊँ जन्म जन्मांतर

तू कोई सहज विचार बन कर के आ

मैं रहूँ परिलक्षित वसुधा से व्योम तक

तू कोई पुलकित स्पर्श बन कर के आ

तू रोज़ रोज़ मेरे ख़्वाब बनकर आ

तू रोज़ रोज़ मेरे ख़्वाब बनकर आ

By The Lost Monk

Writer || Poet || Explorer || Photographer || Engineer || Corporate Investigator || Motivator

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