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घुमन्तू

“घुमन्तू “

वो अनजाने रास्ते जो चन्द लम्हे चलने पर

ओझल हो जाते है और तुम सिर्फ़

इस बात से कतराते हो की उस पार कि दुनिया

बर्बर और भयानक होगी ………!!

जहॉ हमारी शख़्सियत ओछी सी होगी

जहॉ हमारे स्वाभिमान की तौहीन होगी

जहॉ हमारा मुक़्क़दर खोटा होगा

जहॉ हमारा सम्मान छोटा होगा ……..!!

वो अनजान रास्ते जहॉ तुम तन्हा महसूस करोगे

जहॉ दिन छोटे और रात भयानक काली होंगीं

जहॉ तुम्हारी हल्की सी आवाज़ बड़ी बात होगी

जहॉ हुक्मरानों की फ़ौजदारी चारों ओर तैनात होगी

वहॉ चलने के लिये तुमको थोडा फ़क़ीर होना होगा

तुमको लालच खोना होगा , तुमको धर्म खोना होगा

तुमको खुद ईश्वर का पैग़ाम होना होगा

तुमको खुद बादशाह होना होगा

तुमको खुद आज़ाद होना होगा ………!

तब तुम उन अनजाने रास्तों पर पदचिन्हो की लकीरें छोड़ोगे

तुम घुमन्तु दुनिया के नये रास्ते ढूँढोगे

नये चेहरे ढूँढोगे , नये मुसाफ़िर ढूँढोगे

तब तुम नयी कहानी के किरदार लिखोगे

संगीत लिखोगे , प्रेम के दीदार लिखोगे

तब तुम जानोगे की उस पार की दुनिया

ज़्यादा रंगीन और चमकदार थी

वहॉ तो अवसरों की भरमार थी

वहॉ हर कहानी जीवन्त थी

वहॉ संस्कृति थी , इतिहास था

वहॉ दफ़्न हुये रहस्यों मे कुछ ख़ास था

और तुम जब पीछे मुड़कर देखोगे तो पाओगे कि

जब भी तुमने नयी जगहों मे तलाश की है

तुम पहले से ज़्यादा बेहतर होकर आये हो

या तुम नयी दुनिया को जीतकर आये हो

या नयी दुनिया के होकर आये हो ।

उनका जोखिम तो रोमांच है , जीत -हार तक़दीर

नाम ऐक मुसाफ़िर है और आदत “घुमन्तू” है

घुट घुट कर तो लोग महलों मे भी रहते है

उनकी ज़िन्दगी का सिलसिला जीवन्त है ..!

तुम सीखते रहना ,

दिल बड़ा रखना और चलते रहना

तलाश करते रहना ,

ऐक नया रास्ता और ऐक नया सवेरा ….।!!!!!

और घुमन्तू बनते रहना …!!!!

घुमन्तू बनते रहना ……..!!!!

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बर्फ़बारी (Childhood in mountains ⛰)

“बर्फ़बारी ” ~ Lalit Hinrek

छिप गयी हरियाली सफ़ेद चादरों मे

गुमसूमी है छायी चकोर , वानरों मे

ठण्डी मे क्या खॉये बड़ा सवाल हो गया है !

चाय पकौड़ों मे दिल लपलपाये हो चला है

सुबह से मॉ ने मेरे कान ढक दिये है

ठण्डी की वजह से दस्ताने भी दिये है

लेकिन उदण्डी मैं तो निकल पडूगॉ

अपने झबरू मित्र , कालू के संग चलूँगा

जो बर्फ़ के मैदान मे मेरे लंगोटिया जमे है

गोले बना बना के आपस मे भिड़ चुके है

वो पिठ्ठू ,गुल्ली डण्डा या कहूँ कबड्डी

वो गोटियॉ न खेली तो क्या बचपन जिये तुम !!

आज तो सूरज से भी ,जैसे चाँदनी निकल पड़ी है ,

मोती लिए चादरों मे , हर पहर चमक पड़ी है ।

ठण्डी आ गयी है , बर्फ़ छा गयी है

दिन बिदुक गये है और राते लम्बी सी है !

पोष का महीना अपने ऊफान पे है

भूत प्रेत गॉव के सब तूफ़ान पे है !

खूब सर्द रात अब आराम कर लिया है ,

थोड़ी मस्ती के लिये मन, बस तरस रहा है

बर्फ़ पड़ गयी है , स्कूल बन्द पड़े है

ना ख़ुशी सँभल रही , ना हँसी सभंल रही है ।

पहाड़ के बचपनों मे तो , ये आम बात हो गयी है

जो बर्फ़ ये पड़ी है , मस्ती उमड. पड़ी है ।

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मुखौटे ~ Lalit Hinrek

वक़्त ठहरता नही है और तुम्हारे सारे आवरण , मुखौटे धरे के धरे रह जाते है । इस तालाब के किनारे क्या ढूँढ रहे हो ? ये उजाले ??

ये परछाईं ही तो है , लौ जो जल रही है वो तो दिल मे है ।

आज वापस जाकर आइने के सामने खड़े हो जाना और देखते रहना जब तक तुमको तुम्हारा मुखौटा न मिल जाऐ ।

मिल गया तो ऐतबार करना कि क्यों इतनी मासूमियत से तू घर कर गया ।

ऐक शेर अर्ज करता हूँ तुम्हारे लिये

“तुम तो जमाने को बदलने निकले थे “ललित”

लेकिन कमबख़्त जमाने ने तुमको बदल डाला ”

ज़्यादा बड़ा शायर नही लेकिन बात इतनी गहरी कह गया है।

वैसे भी खुश कौन है आज ?

कोई भी नही , सबने तो यहॉ मुखौटे पहन रखे है ।रोने वाले हँसने की ऐक्टिंग कर रहे है । हँसने वाले बेवजह रो रहे है । कोई पड़ोसी की तरक़्क़ी से दुखी है तो कोई परिवार की तरक़्क़ी से । कोई तो बिना बात के दुखी है । ये ज़माना मुखौटों का ज़माना है , यहॉ तुम फ़क़ीर हो तो ये कौन जानता है!

“मुखौटे “ ~ a poem by Lalit Hinrek

शहद सरीखे प्याले जो जिव्ह्वा मे ले के चलते थे ,

डंक मारते उनको ही , अक्सर मैने देखा है ।

कॉन्धो मे शाबाशी के थपके देने वालों को भी ,

ईर्ष्या के दामन मे अक्सर जलते भुनते देखा है ।

आदर्शो पर चलने वाले मन के सच्चे यारों को भी

अपनो का ही अक्सर उपहास उड़ाते देखा है ………..।

आवरण के खौलो मे , चरित्र छुपाने वालों को

भौला भाला सज्जन जैसा , मुखौटा लगाने वालों को

ख़ूब तरक़्क़ी करने से , इक़बाल तुम्हारा ऊँचा हो

शौहरत हो , दौलत हो और नाम तुम्हारा ऊँचा हो ।

भयभीत हुआ हूँ , बदल रहा हूँ

कि मैं भी ऐसा हो जाऊँ

ज़हर रगो मे भर जाये

और ईर्ष्या का दामन हो जाऊँ ।

मन के सच्चे कुछ मानव से

उम्मीद जगाना चाहता हूँ

मुखौटों के संसार से अब

बस ध्यान हटाना चाहता हूँ ।

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शायर मेरी नज़र से

“शायर मेरी नज़र से”

१. बहक जाने दे ऐ वतन तेरी मोहब्बत मे
बस यही वो नशा है जो उतरता नही ।

२.   छुपा लेता है मुस्कुराकर हजारो गुप्तगू
ना जाने कितना मर्म दफ़ॉ है सीने मे ।

३.    उसकी निगाहों मे डूबे हो लाखों सवाल जैसे
न जाने किसे ढूँढती है , किसे चाहती है ।

४.      उनको शिकायत है हम बदलते नही
और हमको शिकायत उनके बदलने से है ।

५.    जिन्दा है लौ वो , कि सुलगती नही है
जलती है तन्हाई तो बुझती नही है ।

६.    लूट ले मेरे यार इस वक़्त की महफ़िल को
थम जाते है तूफॉ यहॉ , ज़िन्दगी की रफ्तार नही थमती ।

७.     बंदिशें ख़त्म कर दी , और आज़ाद हो गये
कभी इधर उड़ चले , कभी उधर उड़ चले
जिधर मन चला हम उधर चल पड़े ।!!।

८.      कल को आज बदलते हुऐ देखा है
कोयलों को भी हीरा बनते देखा है
वक़्त की बात है मेरे दोस्त
कि मजबूर भी मज़बूत हुआ करते है ,
शिद्दत से देख ऑसमॉ को ज़रा
सबसे बड़े अंधेरों से ही
सबसे बड़े उजाले हुआ करते है !!

९.     इस तरह वो मोहब्बत के अल्फ़ाज़ ढूँढते है
निगाहों मे वफ़ा की फ़िराक़ ढूँढते है
हम तो फ़क़ीर है जज़्बात की ज़मीन के
जो रेत मे भी वफ़ा की सैलाब ढूँढते है ।

१०.      कहीं दरिया बदल जाता है
कहीं दलदल बदल जाता है
तेरी मोहब्बत बदल जाती है
तेरा दिल बदल जाता है
मेरा क्या है ! मैं तो पानी हूँ
रेत हूँ और मिट्टी हूँ
जहॉ गिरता हूँ , मौसम बदल जाता है
मौसम बदल जाता है ।
११.    फ़रियादो से मंज़िले कहॉ मिलती है
हमने भी दुऑऐ हज़ार की थी ।

१२.     अब फ़ितरत की नब्ज़ पहचान ली है
कुछ कर गुज़रने की ठान ली है ।
१३.   यहॉ जीना है तो जी भर के जी ले
ग़ुजरे हुऐ ज़माने यहॉ वापस नही आते ।

१४.   हमेशा इसी मिट्टी मे रहना ‘ललित’
आसमा मे उड़ने वालों को ज़मीन नही मिलती ।

१५.  कुछ ऐसे इरादे हो ललित , कि ख्याल बदलते कारवाँ मे हो
निगाहें ज़मीन मे हो हमेशा , और तलाश ऑसमॉ मे हो ।

 

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छोटा सा सपना

“छोटा सा सपना “

वो आकाश उड़ता जहाज़

और तुम्हारा पायलट बनने का सपना

बडे होकर फ़िज़िक्स की उन थ्योरिज

और ज़िन्दगी की कॉम्पलीकेटेड उलझनों मे

कहीं खो सा गया और तुम आगे निकल गये ।

होश आने पर जब सिस्टम समझ आया

तो मन चंचल , कोमल हृदय को बरगलाता गया

कि ज़िन्दगी की रफ्तार तो बस

कलेक्ट्री के काले चमचमाते कोट मे ठहरती है

जहॉ वो सब है जिसकी तुम्हारी ऑत्मा को

तुम्हारे शरीर से ज़्यादा तलाश है ….।

समय बीतता गया , उम्र बड़ती गयी

हाथ मे अब बन्दूक़ की जगह थर्मामीटर

मार्क्सवाद की जगह गॉधीवाद

पेन्टिग्स की जगह संगीत और

साहित्य की जगह इंजीनियरिंग

ऐसे थमा दी गयी और बताया गया

E-mc2 का असल ज़िन्दगी में कोई सरोकार नहीं ।

फिर उम्र के साथ साथ समझ भी बड़ती गयी

की ज़िन्दा रहने के लिये

वो पायलट , वो काले कोट या वो पेन्टिगंस

ज़्यादा ज़रूरी नहीं है क्योंकि

तुम्हारी शिक्षा तुम्हारी ज़रूरतों के हिसाब से है ।

तुम्हारे सपने अब तुम्हारी वरीयताएँ नहीं है ।

क्योंकि तुम्हारे कंधों की चौड़ाई

अब तुम्हारे पिता के बराबर है ।।

समय बीतता गया , और उम्र बड़ते गयी

किताबों की जगह अब ज़िन्दगी सिखाती गयी

कितनी अजीब सी बात है ना ,

हाथ की 20 हज़ार की घड़ी उतनाअच्छा समय नहीं बता पाती ,

जितना वो 20 रूपये वाली घड़ी स्कूल की घण्टी का बताती थी

कितनी तृष्णा थी बड़ा होने की ,

आज पता चला कि छोटा होना हमेशा से बेहतरीन था !

ये शान और शौक़त की पॉलिश

जितनी चमकदार बाहर से है

उतनी ही फीकी भीतर से है ।

अगर तुम बदल सकोगे तो ख़ुद को ज़रूर बदलना

क्योंकि तुम्हारे बाद भी कोई ना कोई

आकाश में उड़ता जहाज़ देखता होगा ।

फीजिक्स ना सही , कैमेस्ट्री पढ़ता होगा ।

वो कोई तो भगतसिंह होगा

कोई तो बारूद होगा

कोई तो फिर लौ होगी

और कोई तो इंक़लाब होगा ।

सपने देखना तो किताबें सिखा देगी

और बाकि सब ज़िन्दगी सिखा देगी ।

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दुविधा

दुविधा — “lalit Hinrek”

किसान गर्व से कहता था कि मैं अन्न दाता हूं ,

इस राष्ट्र की ताकत हूं , और भविष्य निर्माता हूं ।

पर किसान अपने पुत्रों को अब , ‘किसान’ देखना नही चाहता
अपने खेतो की खुशबूओं को ,
लूटते देखना नही चाहता ।

वो बैलों की जोड़ी तो बस ,
छुटपन मे देखी थी ।

जब बकरियॉ थी, गायें थी ,
और लहराती खेती थी ।

ना पशुओं के झुण्ड है ,
ना वो बकरी वाले है ।

खण्डहर जैसे महल बचे है ,
और जंग लगे ताले है ।

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पड़ लिखकर बेटा , बाबू बन जाये
पैसा नाम कमाकर , बस इज्जत दे पाये
खेती को यहॉ मजबूरी माना जाता है ,
दीन हीन की गाथा , मजदूरी माना जाता है ।

नौकरी को सफलता का मानक मोल बैठे है ,
खुशियों को पैसो के तराजू से तौल बैठे है ।

पर ऐक दिन ऐसा होगा , दुविधा ऐसी होगी
ना गेंहू की बलियॉ होगी , भूख आटे की तरसेगी ।

ना गॉव बचे होंगे , ना कोई खेती होगी
मशीन बने मानव की , क्या खूब तरक्की होगी ।

दुविधा मे हूं , फिर क्या सीख दूंगा
ये संस्कृति भी मेरी पीढ़ी तक सीमित है ।

बेटा तू भी पड़ ले , और बाबू बन जा
जब ये भाषा भी इसी जीवन तक जीवित है ।

क्या यही तरक्की की परिभाषा है ,
बस दुविधा मे हूं ।

क्या यही जीवन की अभिलाषा है ,
बस दुविधा मे हूं !!!!

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कुछ तो बदला है !

वो बचपन पहाड़ों का

बाघों की दहाड़ो का

वो बारिश मे काग़ज़ की नावों का

मिट्टी लगाये हर घावों का

वो तस्वीर , घर मे लगे ताले की

गॉव मे हर जर्जर माले की

याद दिलाती है कि कुछ तो बदला है ?

जो हर ऑगन सूना सूना है ।

वो लकड़ी के बण्डल , घासों की जोटी

वो छाछ नूण , मक्के की रोटी

बकरी के मेमने की उछल कूद

वो ककड़ी के बेलें , कद्दू के फूल

ऊन कातती चरखों की सॉचे

बॉस की टोकरीयॉ , रस्सी के फॉके

वो तस्वीर , घर मे लगे ताले की

गॉव मे हर जर्जर माले की

याद दिलाती है कि कुछ तो बदला है ?

जो हर ऑगन सूना सूना है !!

वो झबरू कुत्ते काले काले

खेतो खलिहानों के रखवाले

वो बैलों की जोड़ी अब

खेत नही जोतती है

और गौशालायें मेरी

बस गायें ही खोजती है

वो तस्वीर , घर मे लगे ताले की

याद दिलाती है कि कुछ तो बदला है !

जो हर ऑगन सूना सूना है ।

मशाले जलती थी

तो अंधेरा कम था

बिजली तो आ गयी

बस उजाला कम था ।

मकई , बाजरा , मण्डुआ , चौलाई

कुछ भी देता ना दिखाई

दूध , दही ना , घृत -माखन मेवा

ना पनघट की घाघर सेवा

हर घर है बस ख़ाली ख़ाली

सब तो है बस शहर निवासी ।

वो तस्वीर , घर मे लगे ताले की

याद दिलाती है कि कुछ तो बदला है

जो हर ऑगन सूना सूना है !!!!!

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क्या चाहता हूँ ?

मेरी कहानियों में डूबा हुआ

बस बेसुध सा होना चाहता हूँ ।

छू ले जो दिल के ज़ख़्मों को

कोई वो शायर होना चाहता हूँ ।

ईश्क में इस क़दर खोना चाहता हूँ

कि जैसे बस रोना चाहता हूँ ।

मिलती नहीं मंज़िल तो क्या हुआ !

राही हूँ , बस दीवाना होना चाहता हूँ ।

कोई तो आरज़ू करे मेरे मुखौटे को जीने की ,

कोई ऐसा किरदार होना चाहता हूँ ।

मेरे काम को याद कर ले मेरे आने वाले ,

कोई ऐसा गुमनाम होना चाहता हूँ ।

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पहाड़ों का बचपन

 

6742c7fc-c9aa-4321-8762-520509f2678b                                                         पहाड़ों का बचपन

रात भर मीठी बारिश हो रखी है , आज खेतों की जुताई के लिये बडि़या दिन है , सुबह – सुबह राम के पिता ने राग अलापा । राम और श्याम दोनों भाई  सुबह जल्दी उठना पसन्द नहीं करते थे लेकिन उनकी मॉ भोर तले ही गाय दुहने चली जाती थी । गाय दूह कर वापस आकर कुछ दूध को बाल्टी मे डाल देती थी जिसकी दही जमाई जाती थी बाकि दिनचर्या मे आने वाले चायपान इत्यादि के लिये अलग रख देती थी । सुबह के चार साढ़े चार बजे रोज़ मॉ का यही काम था । पॉच बजे के क़रीब पिता जी भी उठ जाया करते थे और चाय बनाने मे लग जाते थे । पिता चाय बनाते थे तथा इतने मे मॉ जमाई गयी दही को लकड़ी की बनी ऐक हाण्डी मे डालकर मठ्ठा बनाने की तैय्यारी शुरू कर देती थी ।

दोनों लोग फिर चाय पीते और पता नहीं सुबह सुबह क्या बातचीत करते रहते , शायद उनके पास हज़ारों बातें थी जो वो हमेशा ऐक दूसरे से कहते रहते थे । इतना प्रेम था दोनों मे । फिर 6 बजे के क़रीब मॉ मठ्ठा बनाना शुरू कर देती , घिघरी की रस्सी बँधीं हुयी और फिर शुरू ….घर्र घर्र घर्र घर्र !

राम को इस आवाज़ से नफ़रत थी क्योंकि उसकी वो सपनों मे खोई हुयी नींद ख़राब हो जाती थी । लेकिन वो बिस्तर मे पड़ा ही रहता था उठता नहीं था और उसे देर तक सोना पंसद था । उसका भाई श्याम भी उतना ही आलसी था । लेकिन 6 बजे के क़रीब सुबह सुबह पिता आवाज़ लगाते है ,

“ओऐ ! उठ जाओ दोनों आज तीन दिन के बाद आसमान साफ़ हुआ है “

श्याम ने तुरन्त आवाज़ लगाई

“पापा जी आज मे डंगर (पशु) छोड़ने जंगल नहीं जाऊँगा , कल भी मैं ही गया था , आज भाई जी जायेगा “

 

और फिर क्या ! इसी बात पर दोनों भाइयों की लड़ाई शुरू ।

“क्यों मैंने नी छोड़े क्या दो दिन लगातार “ मैं नहीं जा रहा – राम बोला ।

पिता ने उसे चुप कराते हुये बोला अरे बेटा तू बड़ा है यहीं तो जाना है छोड़ दे फिर दोपहर तप जायेगी । गाय भूखे मर जायेगी अन्दर । श्याम तब तक बैलों को खेतों मे ले आयेगा आज मौसम अच्छा है ।

राम ने मुँह बनाया और उठकर रसोई मे घुस गया जहॉ उसकी माँ मठ्ठा बना रही थी । राम मुँह सिकोड़ कर बोला

“आमा जी , मैं नहीं जा रहा ….”

मॉ ने दुलारा और बोला कि

“बेटा चला जा , देख तेरे लिये मे ताज़ा मक्खन भी रखूँगी फिर “

बस राम यही तो चाहता था की उसको कुछ काम के बदले कुछ खास मिले ।वह भागा गोशाला की ओर , किवाड़ों को खोला और फिर 3-4 गाय 3-4 बछड़े , 2-4 जवान बैल जो अभी हल चलाने को तैयार नहीं थे । ऐक बैल की जोड़ी उसने नहीं खोली जो आज खेतों की जुताई करने वाली थी । श्याम और उसके पिता भी पहुँचे और दोनों बैलों को खोला खेतों की ओर ।

पिता बोले

“जल्दी जा बेटा और वापस आजा जल्दी , देखो लोगों ने तो दो दो बार खेतों की जुताई कर भी ली “

आज मौसम अच्छा था , स्वच्छ नीला गगन ऐवम पहाड़ों की चोटियों मे बर्फ़बारी पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी ऐकदम स्वर्णिम ! बेहद खुबसूरत दृश्य !

गॉव के सभी लोगों ने सुबह सुबह अपने बैलों की जोड़ियाँ खेतों मे पहुँचा दी थी और लाल , काले , सफ़ेद मज़बूत कन्धों वाले बैलों ने ऐक अलग समा बॉध दिया था ।

उधर राम अपने डंगर (पशु) लेकर चल पड़ा उनको जंगल की ओर छोड़ने । 7 बजे का वक़्त हो गया होगा , राम वापस आ गया आज वो पशुओं को ज़्यादा दूर नहीं छोड़कर गया बल्की नज़दीक ही छोड़कर भाग आया था । पशुओं को  उनको रास्ते  याद थे वो रोज़ एक ही रास्ते से जाते और शाम तक स्वयं ही वापस भी आ जाते थे बस कभी कभार नहीं आते थे तो उनको लेने भी जाना पड़ता था । फिर कई बार वो जल्दी भी वापस आ जाते थे और फिर दूसरों की फ़सलो को नुक़सान भी पहुँचाते थे , इसका भी ध्यान रखना पड़ता था । कई बार पशुओं के नुक़सान की बजे से लड़ाइयाँ तक हो जाती थी ।राम भागा भागा वापस आया , श्याम और उसके पिता ने तब तक बैलों को जोत के लिये तैयार कर रखा था । जैसे ही राम पहुँचा मॉ ने आवाज़ लगाई

“आजा बेटा ! पहले रोटी खा ले ठण्डी हो गयी फिर चले जाना “

श्याम और उसके पिता खा चुके थे । राम भागकर जल्दी से वापस आया क्योंकि उसे अपनी रिश्वत मक्खन का भी इंतज़ार था । वो रसोई मे घुसा मॉ ने कटोरी मे उसके लिये ताज़ा मक्खन रखा था और मक्का की रोटी बनी थी । ऐक दूध का गिलास और मक्खन लगी मक्के की रोटी ! वाह !

राम ख़ुश था उसे लगा की सिर्फ़ उसकी ख़ातिरदारी हो रही है लेकिन मॉ तो मॉ है , उसने श्याम के लिये भी उतना ही मक्खन रखा था लेकिन श्याम को बोला था कि वो राम को ना बताये वरना राम रूठ जायेगा  ।जल्दी से खाना खा कर फिर राम भी खेतों की ओर भाग गया । पिता ने ऐक खेत मे हल चला दिया था अब खरपतवार वग़ैरह के लिये वह जोल लगवाने के लिये तैयार थे । जोड़ लकड़ी का बना (सरावन /सरण जुते हुए खेत की मिट्टी बराबर करने का पाटा) ऐक यंत्र है जिसमे ऐक पकड़ने के लिये हैण्डल रहता है जो बीचों बीच रहता है । राम और श्याम दोनों बेहद ख़ुश थे की उनको मौक़ा मिलेगा बैठने का , जोल के ऊपर । यह किसी झूले झूलने से कम नहीं था ! हीरा और मोती बैलों की वो जोड़ी और जोल को खींचते हुये आगे बड़ते जाते , उस पर पिता ने अचानक उनको रोक दिया और बोले

“आ जाओ जल्दी ! बैठो “

राम व श्याम भागे और ऐक बॉयी ओर और ऐक दिया ओर । दोनों ने बैलों की पूँछ पकड़ी ओर बैल दनादन आगे बड़ते चले गये । राम और श्याम दोनों ख़ुशी से चिल्ला रहे थे , दोनों ज़ोर ज़ोर से हँस रहे थे और जब तक पूरा खेत समतल नंही हुआ दोनों ने ख़ूब मज़े किये । 8:30  बज गये थे , धूप लग चुकी थी और मॉ ने आवाज़ लगायी ।

“ओऐ ! आ जाओ अब , स्कूल के लिये देर हो जायेगी , पानी गरम कर रखा है नहा लो “

राम भागकर आया , नहाने चला गया । बहुत ख़ुश था क्योंकि आज उसने ख़ूब मस्ती की । 9:00  बज गयी , स्कूल की पहली घण्टी बज गयी । दोनों जल्दी से तैयार हो गये ताकि दूसरी घण्टी 9:30  से पहले स्कूल पहुँच जाये ।

कुछ ऐसा था वो पहाड़ों का बचपन , मैंने भी जिया है !जहॉ खिलौने रोबोट नहीं हमारे जीवन से जुड़े पहलू थे । खेतों की हरियाली और मिट्टी की सुगन्ध । जीवन मे सच्चाई , निर्मलता और बचपन का भोलापन सब बेहद हृदय स्पर्शी है । आज भी कभी ऑंखें बन्द करता हूँ तो याद आती है कि कैसे जीवन ज़्यादा सरल ऐवम खुबसूरत था जहॉ सॉसो को शुद्ध हवा , पीने को स्वच्छ जल मुफ़्त मे मिलता था । आज तो हवा भी पैसों से प्यूरीफाई कर रहे है , आरों से पानी ताकि जीवन का क्रम कुछ ज़्यादा दिनों तक बना रहे ! समय का चक्र है और यादों का सहारा , जो लिये जा रहा है ।

वो घाटी का बचपन और वो घाटी के वासी , दोनों मेरे हृदय के सबसे क़रीब पहलू है ।

 

 

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प्रश्न

“ प्रश्न “ – (The Question )

कुछअधुरे ख़्वाब तो होगें ?

कुछ अधुरे सवाल तो होगे ?

क्या है वो पल जिसके लिये तुम

सारा ज़मीं ऑसमा ऐक कर सकते हो ,

क्या है वो पल जिसके लिये तुम

हज़ार बार मर कर भी लड़ सकते हो !

सामने आइने के पुछ लो ये प्रश्न कि

क्या कर रहे और कहॉ जा रहे हो ?

मिल गये जबाब तो नये सवाल लो ,

ख़त्म है ख़्वाब तो नये ख़्वाब लो ..।।।

ग़लतियों मे सुधार की ज़मीं तलाश लो ,

निशब्द ख़्वाब के लिये फिर नयी मशाल लो ,

मैदान मे दृढ़ संकल्प लो इस जंग का ,

नया रंग रक्त का और हृदय उंमग का ,

तप की स्याही से श्रम की लेखनी तक ,

सफल हुये हर ख़्वाब की हर कहानी तक ,

पुछते चलो बस पुछते चलो ,

हर दफ़ा उस आइने से ये प्रश्न पुछते चलो !

क्या है वो पल जिसके लिये तुम

सारा जमी ऑसमा ऐक कर सकते हो …..।

…….हज़ार बार मरकर भी लढ़ सकते हो …।।।