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दरिया (EP-1)

If you find my stories dirty , the society you are living in is dirty ~ Munto

कई कहानियाँ दिल को छू जाती है । क्या पता यह आपके दिल को छू जाऐ । यह कहानी मेरे मित्र द्वारा सुनायी गयी जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है । ये कहानी है रिश्तों की , मोहब्बत की , ख़ुशी की और ज़िन्दगी के मायनों की ।

कहानी शुरू करते है मेरा नाम सागर है । मेरे पूर्वज कुमाऊँ हिमालय के अल्मोडा ज़िले के बाशिंदे थे जो रोज़ी रोटी की तलाश मे 1978 मे मुंम्बई आ गये थे । मैं उस वक़्त मात्र 5 साल का था । मेरे पिता के साथ साथ मेरी मॉ , मेरी बहन , मेरे चाचा चाची और उनके दो बच्चे भी साथ आये थे । गॉव मे सिर्फ़ मेरे दादा दादी ही बचे थे जो गॉव मे हम लोगों की ज़मीन जायदाद का ख्याल रखते थे । मेरे पिता ऐक होटल मे कार्य करते थे और हम लोग ऐक छोटे से मकान मे ऐक साथ रहते थे । शुरूवात के दिनों मे हम लोग साथ रहते थे लेकिन चाचा की ऐक मैनुफ़ैक्चरिंग कंपनी मे नौकरी लगने के बाद दोनों परिवार अलग अलग रहने लगे । मेरे पिता बेहद मेहनती व्यक्ति थे और पॉच – छ साल के अन्दर ही हम लोग अंधेरी में ऐक फ़्लैट में शिफ़्ट हो गये ।

मेरे पिता का नाम बलबीर सिहं था और प्यार से उन्हें बॉबी कहते थे । मेरी मॉ शकुन्तला घरेलू महिला थी जो पूजा पाठ इत्यादि में लीन रहती थी । मेरी बहन कंचन मुझसे तीन साल छोटी है ।

मेरे चाचा सतबीर सिंह मार्केटिंग मैनेजर थे और धीरे धीरे उन्होंने अच्छी तरक़्क़ी कर ली थी । हमारे दोनों परिवार आस पास ही रहते थे और प्रत्येक दिन ऐक दुसरे के यहॉ जाना लगा रहता था । मेरा चचेरा भाई मयंक है जो मुझसे ऐक साल छोटा है लेकिन हम लोग ऐक साथ ही स्कूल में भर्ती हुये थे तो हम भाई होने के साथ साथ अच्छे दोस्त भी थे । मेरी चचेरी बहन जान्वही है जो मुझसे छ साल छोटी है ।

शुरूवात के सालों में हम लोग प्रत्येक वर्ष ऐक बार तो गॉव जाते थे और गर्मियों की छुट्टियों में कम से कम ऐक महिना ज़रूर बिताते थे । मेरे दादा जयसिहं और दादी शारदा देवी हमारे लिये तरह तरह के पहाड़ी पकवान बनाते थे और ढेर सारे फल इत्यादि खाने को देते थे । लेकिन हमारी दसवीं के बाद से चीजें बदलने लगी । बोर्ड के ऐक्जाम थे मेरे पिता ऐवम् चाचा दोनों हमारी पढ़ाई को लेकर बेहद सीरियस थे इसलिये पूरे साल मेरी और मयंक की ट्यूशन लगवाई गयी ताकि हम अच्छा स्कोर कर सके । हम पढ़ने में अच्छे थे और स्कूल के अच्छे बच्चों में हमारी गिनती होती थी । मैं गणित में बेहद लोकप्रिय था और मैंने मैथ्स ओलम्पीयाड में ब्रॉन्ज़ मेडल भी लिया था । मेरे पिता को मुझसे बेहद उम्मीद थी और मैं भी आदर्श बेटा होने के नाते उन्हें निराश नहीं करना चाहता था । मैंने बहुत मेहनत की और बोर्ड में 91% अंक प्राप्त किये । मंयक के भी 87% अकं आये तब पहली बार चाचा को निराश देखा की मंयक के मुझसे कम नम्बर आये है ।

ख़ैर मैं और मंयक ना सिर्फ़ भाई थे लेकिन भाईयों के भी भाई थे । कहीं भी कोई बात हो जाये हम ऐक दुसरे का साथ कभी नहीं छोड़ते थे । कोई भी बात छुपानी हो या कभी भी ऐक दुसरे का साथ देना हो हम कभी पीछे नहीं हटते थे ।

उस साल गॉव नहीं जा पाये । रिज़ल्ट के बाद से ही घर वाले डिस्कशन में लगे रहते कि हमें कौन सा स्कूल और कौन सा कोर्स करवाना है । छुट्टियों के दिनों में हमारी अंग्रेज़ी की ट्यूशन लगवाई गयी ताकि हम लोगों के कम्यूनिकेशन स्किल अच्छे हो जाये । तीन महीने तक अंग्रेज़ी सीखी और पता भी नहीं चला कब टाइम निकल गया । सुबह हम लोग क्रिकेट एकेडमी जाते और शाम को ट्यूशन । यही रूटीन था वक़्त कैसे निकल गया पता ही नहीं चला । दादा दादी से फ़ोन पे बात होती थी । वो लोग बहुत मिस करते थे । कई बार दादी इमोशनल होकर कहती थी कि मरने से पहले ऐक बार देखना चाहती हूँ तो बहुत बुरा लगता था । मैंने पिता जी को कहा था की दादा दादी को मुंबई बुला लो लेकिन वो मुंबई नहीं आना चाहते थे वो कहते थे कि वो अपना बुढ़ापा पहाड़ों में काटना चाहते है ।

दादाजी फ़ौज से रिटायर्ड थे उन्हे पैंशन मिलती थी तो घर का खर्चा आराम से चल जाता था । लेकिन बुढ़ापे की वजह से वो ज़्यादा काम नहीं कर पाते थे । मुझसे कहते रहते थे की ज़मीन बंजर होते जा रही है इसका उन्हें बेहद दुख है ।

फिर बस फ़ोन में बातचीत होती रहती थी । मुझे कॉमर्स में ऐडमिशन लेना था और मंयक को साइंस में । हमारे मार्क्स अच्छे थे तो दोनों को ऐडमिश्न मिल गया ।

परिवार बेहद खुश था । हमने सबने मिलकर ऐक पार्टी रखी थी जिसमें हम लोगों ने खूब डॉन्स किया । वो दिन भी खुबसूरत दिन थे जिसमें मॉ बाप बस हमारे पास होने पर गर्व करते थे ।

अगले साल ग्याहरवीं के ऐग्जाम के बाद हम लोग गॉव गये । दो सालों में कितना कुछ बदल गया । दादा और दादी ऐक दम बूढ़े लगने लगे थे । सफ़ेद बाल और झुर्रियों वाला चेहरा , चलने में लड़खड़ाहट और बोलने में रूकावट । ऐकदफा मैं हैरान हो गया कि क्या यही वो दादा दादी है जो बचपन में मुझे उठा उठा के घुमाते थे लेकिन आज चल भी नहीं पा रहे । मैं इंमोशनल हो गया और अंदर ही अंदर मुझे बुरा लग रहा था । दादा जी ऐक दिन शाम को मुझे और मंयक को साथ ले गये और हमारी ज़मीन जायदाद दिखाने लगे । दादा जी कह रहे थे की यदि तुम लोग इतनी ज़मीन में मेहनत करोगे तो तुम्हें कहीं भागने की ज़रूरत नहीं । लेकिन खेती में कुछ रहा नहीं आजकल , लोग खेती को बढ़ावा नहीं देते है और इससे दूर भागते है । तुम लोग ऐसा मत करना और अपने पूर्वजों की विरासत को खो मत देना । उस दादा ने रात को अपने दादा की कहानी सुनाई ।

कहानी गडरियों की जो साल भर अपनी भैड़ बकरियों और भैंसों के झुण्डों के साथ रहते थे । दादाजी कहते थे की उनके दादा धनसिंह इलाक़े के सबसे बड़े गडरियों में से ऐक थे । दादा कहते थे कि उनके भी दादा ने हिमालय बहुत सी यात्रायें की थी । कई दफ़ा उनका पाला हिमालय में रहने वाली कई प्रकार की जनजातियों से हुआ था जो तंत्र मंत्र व जादू टोना से इंसान को बकरी बना सकते थे । वे जातियाँ आज भी हिमालय के कई इलाक़ों में मौजूद है । ये कहानियाँ बेहद रोमांचक होती थी । दादा कहते ऐक वक़्त उनके दादा के पास 2000 भैड़ बकरियाँ थी और उनका परिवार इलाक़े के सबसे रसूखदार ख़ानदानों में ऐक था । लेकिन ज़माना बदलता गया और व्यावसायिक दृष्टिकोण भी बदल गया । अब लोग पढ़ लिखकर टैकनिकल होते जा रहे है और अपनी विरासत को भूलते जा रहे है । दादा जी चाहते थे मैं और मंयक अपनी विरासत को ज़िन्दा रखे लेकिन आज के दौर में यह संभव नहीं था । उन्हें भी पता था कि वो हमें अपने पास रखना चाहते थे लेकिन गॉव लगभग विरान ही हो चुके थे और लोग सिर्फ़ छुट्टियों के समय ही दिखाई देते थे । वहॉ ना अच्छी रोड थी , ना अस्पताल था और न ही अच्छे स्कूल थे ।

ख़ैर छुट्टियाँ ख़त्म होने के बाद हम लोग गॉव से निकल रहे थे । दादा ने मुझे और मंयक को हज़ार- हज़ार रूपये दिये जिसके बारे में हमने घर में कभी भी ज़िक्र नहीं किया और उसके खूब मज़े किये । हम लोग मोहल्ले में क्रिकेट टीम बनाते थे जिसमें पचास – पचास रूपये का मैच चलता था । मेरी और मंयक की टीम होती थी और हम हमेशा जीतते थे । पचास रूपये जितने से ऐसा लगता था जैसे हम किसी रईसज़ादे से कम नहीं । फिर उसके बाद फिर से बोर्ड ऐग्जाम आने को थे । इसी बीच दादा और दादी की तबीयत ख़राब हो गयी । गॉव से बुलावा आया । मेरे पिता और चाचा दोनों गॉव चले गये लेकिन हम लोग नहीं जा पाये क्योंकि बोर्ड ऐग्जाम थे । मैं उनसे आख़िरी बार मिलना चाहता था । लगभग एक माह तक दोनों अस्पताल में रहे । पहले दादी की मृत्यु हो गयी और फिर ऐक हफ़्ते के बाद दादा की मृत्यु हो गयी । यह बिल्कुल सपने की तरह लगता है । दोनों अब हमारे साथ नहीं है मैं सोलह साल का था और मंयक पन्द्रह साल का । दादा कहते थे

“सागर और मंयक , खूब मेहनत करना और तरक़्क़ी करना । अपने पूर्वजों को याद करना और उनकी विरासत को जिन्दा रखना । हमें मालूम है तुम अच्छा काम करोगे और हमारे बाप दादाओं के बाप दादा स्वर्ग के द्वार से देख रहे होगें । उन्हें भी तुम पर गर्व होगा ।हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है ।”

जैसे ही मालूम पड़ा कि दादा दादी नहीं रहे , यह मालूम नही था कि कैसा अनुभव है बस रोना आ रहा था । मैंने उस रात खाना नहीं खाया । मंयक भी मेरे साथ था । कंचन भी भूखी सो गयी और जान्वही भी ।

उस दिन चीख चीख कर कहने का मन था । दादी मॉ और दादा जी हम आपसे बेहद मोहब्बत करते हैं लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि अन्तिम समय में हम आपके साथ नहीं थे । कुछ दिन के बाद फिर से सब चीज़ें सामान्य हो गयी । हम लोग बोर्ड ऐग्जाम की तैय्यारियॉ करने लगे ।

बोर्ड ऐग्जाम अच्छे हो गये रिज़ल्ट भी शानदार आया था । ऐग्जाम के बाद ही हम लोगों की कोचिगं स्टार्ट हो गयी थी । अब कॉम्पिटशन की तैयारी थी । मयंक इंजीनीयरिंग के लिये और मुझे कॉमर्स /बी०बी०ऐ के लिये तैयारी करनी थी । मैंने मुंम्बई यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी के लिये ऐप्लाई किया था और मयंक ने भी चार पॉच ऐग्जाम दिये थे । अब घरवाले को आगे की चिंता थी कि कौन सा कॉलेज मिलेगा और कौन सा कोर्स करेगे । मयंक को नामी इंजीनियरिंग कॉलेज मे कम्प्यूटर साइंस में ऐडमिशन मिल गया । मेरा रिटन ऐग्जाम अच्छा हुआ था बस रिज्लट आना बाकि था । मेरे पिता चाहते थे कि मैं सैंट जेविर्स कॉलेज (St Xavier’s College) में भर्ती हो जाऊँ लेकिन वह रिज़ल्ट पर निर्भर करता । कुछ दिन बाद रिज़ल्ट आ गया और मुझे बी० बी० ऐ० (BBA) के लिये सेंट जेविर्स कॉलेज मिल गया ।

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बारह आने

(If you find my stories dirty , the society you are living in is dirty ~ Munto )

वक़्त का पहिया भी बड़ा अजीब है ऐसे दौड़ता है कि पता भी नही चलता कि समय कैसे बीत गया । पीछे मुड़कर देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि कल की तो बात है , ऐसा लगता है कि सपना ही तो है कल मैं स्कूल मे पड़ता था , कल ही तो कॉलेज मे दाख़िला लिया था , कल की तो बात है इश्क़ मे पहली बार दिल टूटा था और आज !

आज सुबह सी लगती है , जैसे कल रात का सपना था जो रौशनी की पहली किरण के साथ धूमिल हो गया और फिर ये आज भी ऐक कल बन जायेगा । इस कल मे न जाने कितनी हसीन कहानियॉ छुपी होगी जो आपको हंसाती होगी , कई बार रूलाती भी होगी और कई बार ये अहसास भी कराती होगी कि अगर ऐसा किया होता तो ऐसा होता । ज़िन्दगी का ताना बाना ही तो है ये कहानियाँ जो आपको आप बनाती है और हमको हम बनाती है ।

ऐक दिन सब कुछ यहीं छूट जायेगा , राजा और रंक दोनों ही ख़ाली लौट जायेगे लेकिन वो राजा भी ग़रीब ही होगा जिसकी ऐक भी कहानी उसके बाद याद नही की जायेगी और वो प्रजा का ऐक वो हिस्सा भी है जिसने कहानियों को जिया है और जो हमेशा हमेशा के लिये यहॉ किसी न किसी की यादो मे , किन्हीं हिस्सों मे , किसी ख़ुशबुओं मे , कहीं न कहीं मिलता रहेगा और हमेशा याद किया जाता रहेगा ।

बारह आने भी साठ के दशक की कहानी है । आज बूढ़ा हो चुका हूँ और कहानी लिखते लिखते अपना वो छुटपन जीना चाहता हूँ । गॉव मे मेरे पिता ऐक छोटे से किसान थे और मॉ बेहद ही धार्मिक गृहिणी । हम चार भाई बहन थे जिनमें सबसे बडी बहन थी , फिर मैं , फिर छोटा भाई और सबसे छोटी बहन थी ।मॉ रोज पूजा पाठ करने वाली महिला थी और हम भी सुबह शाम पूजा मे शामिल हो जाया करते थे । मैं छठी कक्षा मे पड़ता था तथा छोटा भाई पाँचवी कक्षा मे पड़ता था । हम दोनों बहुत ही उद्दण्डी थे तथा ख़ूब लड़ाई किया करते थे । छोटा भाई मुझसे भी ज़्यादा उद्दण्डी था जो कभी कभार किसी गॉव वाले के बादाम तो कभी सन्तरे वग़ैरह अपने दोस्तों के साथ चुराता था । कई बार उसकी शिकायत घर मे भी पहुँच जाती थी तो पिता जी उसे ख़ूब मार लगाते । गॉव मे अन्धविश्वास बहुत ज़्यादा होता था लोग अगर बीमार भी हो जाते तो डॉक्टर के पास कभी नही जाते बल्कि गॉव के देवता या माली (जिस पर देवता अवतरित होता है ) को बुलाकर झाड़ फूँक करवाते थे । आज का दौर बदल गया है लोग ज़्यादा शिक्षित ऐवम जागरूक हो गये है ।

बचपन बेहद नाज़ुक होता है जो आस पास का वातावरण होता है वह आपके चरित्र मे समा जाता है । यह कहीं न कहीं आपके भविष्य मे जीवन पर्यन्त प्रभाव डालता है । हम लोग स्कूल से आने के बाद कन्चे (कॉच की गोलियाँ) खेलते थे । उस वक़्त यह हमारे वक़्त का सबसे पॉपुलर खेल था । आजकल तो लोग पब जी (PUB G) न जाने कैसे कैसे आभासी (virtual) गेम खेलते है लेकिन वो दौर अलग था । हमारे पास संसाधन कम थे लेकिन वक़्त बेहिसाब था । एक आने में दस कन्चे मिलते थे यदि कोई दुकान से लेता था लेकिन ऐक आने के बारह मिलते थे यदि हम साथ के लड़कों से लेते थे । मेरे साथ के कुछ दोस्त और मेरा भाई हम सब मिलकर खेलते थे और बहुत दिलल्गी से खेलते थे । एक बार मैं बुरी तरह हार गया मेरे सारे कन्चे दोस्तों ने जीत लिये । अब मेरे पास न तो पैसे थे कि मैं कुछ कन्चे ख़रीद सकू और न कोई मुझे उधार देना चाहता था । मैं निराश होकर घर चला आया । पिता जी घर पर नहीं थे और मॉ गायों को चारा डालने गोशाला गयी थी । बड़ी बहन रसोई में रोटियॉ बना रही थी और सबसे छोटी रसोई में खेल रही थी । मैं अंदर गया और पता नहीं क्या ख़्याल आया की सीधा पूजा वाले कमरे में गया । वहॉ मैंने देखा की पूजा की थाली में कुछ सिक्के रखे है लेकिन सामने भोलेनाथ की मूर्ति और तस्वीरें थी और मॉ दुर्गा की मूर्ति तो ऐसा लग रहा था कि मुझे ही देख रही हो । कुछ देर सोचा फिर तृष्णा ने आस्था पर हावी होकर कहा , भोले बाबा माफ़ कर देना मुझे पैसों की सख़्त ज़रूरत है और पैसे उठाकर घर के पीछे के खेत में और स्लेट के नीचे रख दिया । मैं कॉप रहा था तो पैसों को गिन भी नहीं पा रहा था यह अक्सर होता है जब भी कोई ग़लत काम करते है । पैसे रखने के बाद बड़ा अच्छा लग रहा था कि अब मैं भोलेनाथ की कृपा से अमीर हो गया हूँ । मैंने किसी को नहीं बताया और बिल्कुल शरीफ़ बच्चा बनकर पडाई करने में जुट गया । मॉ ने शाम की पूजा मे देखा तो उन्होंने पिता जी को बोला ।

पिता जी ने रात का खाना खाते हुये सबसे पूछा कि मंदिर से बारह आने ग़ायब हुये है , किसने लिये है ? ईमानदारी से बताओ की चोर कौन है ?

सबको छोटे भाई पर शक हुआ क्योंकि वह उद्दण्डी काम करता रहता था । छोटा भाई देवते की क़सम खा खाकर अपनी बेगुनाही के सबूत देता रहा लेकिन उसकी बात पर कोई विश्वास ही नहीं कर पा रहा था ।

पिताजी ने सबसे पूछा । बड़ी बहन ने भी कुल देवता की क़सम खाई कि उसने नहीं लिये है । अब मेरी बारी आयी तो मैंने भी क़सम खा ली क्योंकि मैंने तो चोरी करने से पहले एक संवाद कुल देवता के साथ जारी रखा ही था फिर अब एक झूठ पहले झूठ को बचाने के लिये और सही ।कोई भी ये मानने को तैयार नहीं था कि किसने पैसे लिये है हॉलाकि छोटे भाई को सर्वसम्मति से चोर घोषित किया जा चुका था ।

फिर पिताजी ने अगली सुबह सबको बुलाया और बताया की आज वह देवता के माली को बुलायेंगे और देवता यह बता देगा की चोर कौन है । अभी भी बता दो चोर कौन है वरना पूरे गॉव में बड़ी बेइज़्ज़ती होगी । अब मुझे डर लगने लग गया की अगर देवता ने सही में मुझे पकड़ लिया तो फिर क्या होगा ?

मैंने पिताजी को कहा की हम लोग ढूँढ लेंगे तो पिताजी ने कहा की ठीक है ढूँढो वरना दोपहर में फिर देवता के माली को बुला लूँगा । इसके बाद बहने घर के अन्दर ढूँढने लग गयी कि कहीं इधर उधर न गिर गये हो । मैं बड़े चालाकि से घर के पीछे चला गया और छोटे भाई को भी लेकर गया । मैंने स्लेट को नीचे पैसे छिपाये थे और क्योंकि वहम खेत में काफ़ी स्लेटे थी तो मैंने एक जानवर की हड्डी उसके ऊपर निशानी के तौर पर रखी थी । अब हम ढूँढने लग गये लेकिन दुविधा ये थी कि मैं कैसे निकालू यह पैसे तो मैंने छोटे भाई को बड़े मासूमीयत के साथ बोला

“भाई कई बार चोर कुछ निशानी छोड़ देते है , ढंग से ढूँढना उधर जैसे कई बार हड्डी वग़ैरह वे निशानी के तौर पर छोड़ देते है “

छोटा भाई मेरे वास्तविक इरादों से बिल्कुल अनभिज्ञ और धीरे धीरे उस स्लेट के पास जा पहुँचॉ जहाँ बारह आने रखे थे । जैसे ही उसने स्लेट हटाई बारह आने दिखाई दिये ।

वह चिल्लाया “भाईजी पैसे मिल गये “

जैसे ही वह चिल्लाया मैं घर की तरफ़ भागा और चिल्लाता हुआ पिता जी के पास गया और बोला पिताजी पैसे छोटू ने ही लिये थे उसी को मिले है वो ही चोर है ।

छोटा भाई चिल्लाता हुआ आया और बोला की पिताजी पैसे मिल गये । मैं तैयार नही था कि मुझ पर बात आये लेकिन जब छोटे भाई ने पूरा वाक्या सुनाया कि कैसे मैंने कहा की चोर निशानी छोड़ देते है तो पिता जी को मालूम पड़ गया कि पैसे मैंने चुराये थे । पिताजी मुस्कारये और बोले की बता दो वरना शाम को देवता बुला लेंगे । मैंने डर से स्वीकार कर लिया क्योंकि मुझे लगता था शाम को अगर देवता आ गये तो मुझे पकड़गें । बाद मे कई सालो तक इस बात को लेकर मेरी ख़ूब खिंचाई होती थी । आज भी ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात है और आज भी मेरे ज़ेहन में ज़िन्दा है । हम आज जब भी कभी इसका ज़िक्र करते है तो बस हँसते है कि कितने मासूम थे वो छुटपन के दिन ।

उसके बाद धीरे धीरे यह भी समझ आया कि देवता तो मन का डर है जो यह अहसास दिलाता है कि बुरा मत करो वरना देवता दण्ड देगा , फिर धीरे धीरे समझ आया कि देवता तो कर्म है जो जीवन का सार है कि बुरा करने से बुरा ही होगा । जैसे जैसे बड़े होते गये वो बारह आने सीख बनते गये कि मुश्किल से मुश्किल वक़्त में भी ग़लत क़दम मत उठाओ ।बारह आने ने मुझे यह भी सिखाया कि हर बच्चा बेहद क्रियेटिव होता है जो बचपन से ही कहानी बुन सकता है 🤠🤠

बारह आने सिर्फ़ कहानी नहीं है बल्कि एक जीवन का अंग है जो ताउम्र साथ रहेगा ।

💕💕💕

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उधडे जूते


मैं ऐक छोटे से क़स्बे मे रहता था । गॉव मे जातपात , छुआ छूत और अंधविश्वास के ढकोसलों का पूरा वातावरण था । गॉव मे सवर्ण (राजपूत ऐवम् ब्राह्मण) तथा हरीजन सब मिलकर रहते थे । मैं छोटी जाती से था । मेरे परिवार मे माता पिता तथा ऐक बडी बहन और मैं , बस चार लोग थे । हमारे पास ज़मीन नही थी क्योंकि जो ज़मीन हमारे पूर्वजों की थी वह अब ऊँची जाती के लोगों के पास थी क्योंकि किसी ना किसी मजबूरी मे उन्होंने इन लोगों को बेच दी थी । पिता जी बंधुआं मज़दूरी करते थे क्योंकि उन पर हमेशा क़र्ज़ रहता था । मेरी मॉ भी ठुकराइनो और पंडिताइनो के यहॉ काम करती थी । मैं दस साल का था और बडी बहन चौदह साल की । वह कक्षा 9 मे पड़ती थी तथा मैं कक्षा 6 में । मैं भले ही दस साल का था लेकिन ऐक आज्ञाकरी बालक था जो हमेशा अपने माता पिता की बात मानता था । सुबह उठ कर अपनी गायों को जंगल की तरफ़ ले जाता था और फिर स्कूल के लिये तैयार होता था । गॉव मे मात्र ऐक सरकारी इण्टर कॉलेज था तथा उसी मे सब पड़ते थे । मैं पडाई मे हमेशा अव्वल आता था तथा हमेशा गुरूजनों का आदर करता था लेकिन गॉव के कुछ स्वर्णों के बच्चे मुझे नापसन्द करते थे । मैं नही जानता था क्यों ? शायद उतनी उम्र ये सब समझने के लिये काफ़ी नही थी ।
ऐक बार की बात है स्कूल मे ऐक वार्षिकोत्सव समारोह आयोजित किया जाना था । मेरे पास नये कपड़े भी नही थे और मेरे जूते भी बिल्कुल फटे हुये थे । जब भी मेरे जूते फट जाते थे तो मेरी मॉ उसमे टॉका लगा देती और मैं वो जूते दस पनंद्रह दिनों तक और चला लेता । फिर मॉ बार बार ऐसा ही करती जब तक जूतों को फेंक देने की कोई वजह ना हो ।
मैं कभी शिकायत नही करता था क्योंकि वो दिन ऐसे थे की जो कुछ भी मिलता था वही सुकून था । वो दिन ऐसे थे की शायद ही किसी से कोई फ़र्क़ पड़ता था और मस्तिष्क मे पवित्रता इतनी थी की समाज मे व्याप्त भ्रष्टाचार ऐवम बुराईयॉ उसे प्रभावित कर सकती थी ।

मैंने पहली बार पिता जी को बोला कि मेरे स्कूल मे वार्षिकोत्सव है और मेरे पास कपड़े नही है । पिताजी मुझसे बेहद प्रेम करते थे क्योंकि मैं हमेशा पडाई मे अच्छा करता था और बस यही ख़ुशी थी जो मैं उनको दे सकता था । पिताजी ने कहा की वो नये कपड़े ख़रीद लेंगे । मैं खुश था और मैने बहन को बोला की मेरे लिये नये कपड़े आने वाले है । मेरी बहन कभी कोई डिमाण्ड नही करती थी शायद थोडा बड़े होने की वजह से वह घर की नाज़ुक हालत समझती थी । मुझे कुछ नही पता थी की घर कैसे चलता है और कैसे पिताजी जी तोड़ मेहनत कर दो जून की रोटी का इन्तज़ाम करते है । पिताजी ने मेरे लिये ब्लू रंग की जीन्स और ऐक जिन्स की शर्ट ख़रीदी और जब पिताजी घर आये तो मैं ख़ुशी से पागल हो गया । ब्लू रंग की जीन्स , मैने जीन्स इससे पहले कभी नही पहनी थी । स्वर्णों के बच्चो को देखा था बस जीन्स पहनते लेकिन मैं तो हमेशा नीलामी के सैकण्ड हैण्ड कपड़े या फिर सवर्णो द्वारा दान किये गये पुराने कपड़े ही पहनता था । आज नयेपन का अहसास था, नयेपन की उम्मीद थी और जीत जाने की उमंग थी ।
मैने विद्यालय के वार्षिकोत्सव मे ऐक भाषण प्रतियोगिता और निबन्ध प्रतियोगिता मे भी हिस्सा लिया था । मैं अच्छा वक़्ता था , अच्छा लेखक था और अच्छा प्रस्तुतकर्ता भी था । जीतने वालों को ईनाम भी दिया जाना था । मैं तो मानो सातवें आसमान मे था । फिर वार्षिकोत्सक का दिन आया , मैने कपड़े पहने , बडी बहन ने दुलराकर आज मुझे तैयार किया । आज वो मुझे गुड्डे के जैसे सजा रही थी । मैने अपने जूते डाले , मेरे पास जूते नये नही थे । वो पुराने जूते जिस पर मॉ ने एक बार टल्ली चस्पाँ चुकी थी लेकिन वो उधड़ कर खा हो चुकी थी । फिर भी मैं होनहार बीरबान मस्त मौला तैयार होकर चल पड़ा स्कूल । स्कूल में मेरे सब दोस्तों ने मुझे मेरी नई जीन्स के लिये बधाई दी । सबने तारीफ़ की वाह आज तो तुम विलायती लग रहे हो । हम भारतीयों में ये बात शायद ग़ुलामी के समय से ही थी की विलायती होना गर्व की बात माना जाता है । पिता ने भी शायद इसी उम्मीद से नई जीन्स ख़रीदी होगी । फिर स्कूल में भी तरह तरह के लोग होते है जैसे समाज में तरह तरह के लोग होते है । कुछ लड़कियों का झुण्ड मेरे सामने स्टेज के रास ही खड़ा था और खिलखिलाखल हस रहा था । मैं दस साल का बालक शायद इस बात से अनभिज्ञ था कि उनकी हँसी का माजरा क्या है । तभी एक सीनियर जो कक्षा दस में पड़ती थी , ने मुझे बुलाया , वह क़स्बे के नामी ब्राह्मण की लड़की थी । मैं चला गया और वो मेरे कपड़ों की तारीफ़ करने लगी । बाक़ी उसकी सहेलियाँ ज़ोर ज़ोर से हंस रही थी ।

फिर उसने कहा , “कौन लाया तेरे लिये जीन्स ?”
मैं , “ पिताजी ले के आये है “

फिर वो बोली “ऊपर से तो सब ब्यूटीफ़ुल है और नीचे से फटाहुआ पुल है “

दूसरी बोली जब औखाद नहीं होती तो पहनने नहीं चाहिये ।
तीसरी बोली “किसी से मॉग कर लाये होगें ये तो खाना भी मॉग कर खाते है “
सब लड़कियाँ ज़ोर ज़ोर से हंस रही थी ।

I cried because I had no shoes until I met a man who had no feetAnonymous

मैं शर्म से लाल हो गया था , ये शायद ज़िन्दगी का पहला अवसर था कि ख़ुद पर हीनता महसूस हुयी । मुझे नहीं पता था वे लोग मुझसे नफ़रत क्यों करती थी या फिर इस प्रकार की सोच उनमें कहा से आयी । मैं तो एक ग़रीब परिवार का बच्चा था जिसका किसी से कभी भी कोई द्वेष नहीं था । मैं कुछ नहीं बोला और वो सब लड़कियाँ हँसती रही । मैं एकदम शान्त कौने में खड़ा हो गया, ज़िन्दगी में पहली बार कुछ न होने का अहसास हुआ । मेरा भाषण भारत की आज़ादी के संघर्ष पर था लेकिन मैं आज़ाद महसूस नहीं कर पा रहा था । ख़ैर यह पहला मौक़ा था मेरे जीवन का जिसने एक पाठ सिखाया की जूते फटे होना समाज व्यक्ति की द्ररिदता समझता है लेकिन मैं तो बेहद अमीर था शायद दिल से सोच से । मेरा भाषण अच्छा नहीं हुआ क्योंकि आज़ाद होने का ख़्याल ही चला गया , मैं तो जकड़ा हुआ महसूस कर रहा था ग़रीबी की ग़ुलामी , जाती की ग़ुलामी और हार की ग़ुलामी । मैं भाषण में तीसरे स्थान पर रहा , यह पहला मौक़ा था मैं हार गया था । मेरा निबन्ध में कोई स्थान ही नहीं आया , यह पहला मौक़ा था मैं सांत्वना पुरस्कार भी न पा सका । बड़ी बहन को कुछ महसूस हुआ कि मैं तो बहुत ख़ुश था आस्वश्त था फिर अच्छा क्यों नहीं परफ़ार्म कर पाया । घर जाकर बड़ी बहन ने पुछा क्या हुआ “सोनू “
अब तो पिताजी ने तुझे नयी जीन्स शर्ट भी ला कर दी लेकिन तू तो बहुत पीछे हो गया ।
मुझे ग़ुस्सा आया और रोना आ गया कि बस जीन्स शर्ट दिये ना , मुझे जूते नहीं लाये नये , ये फटे हुये जूते दिये जिसमें सबने मेरी बेइज़्ज़ती की है ।

मैं गहरी सिसकियाँ लेने लगा , दीदी ने पुछा की बात क्या हो गयी । मैंने पूरा वाक्या बताया । बड़ी बहन ने ग़ुस्सा ज़ाहिर किया और बोला की मैं उन लोगों को बताती हूँ कल ।
हम उनसे मॉग के खा रहे है क्या ??
मेहनत करते है भीख नहीं मंगते ।

शाम को पिताजी आये और दीदी ने पूरा वाक्या पिताजी को बताया । पिताजी को बताते बताते दीदी रोने लगी उसके ऑसू छलकता देख मेरे भी ऑसू निकल गये । पिताजी ने पूरा वाक्या सुना और थोड़े से मुस्कुरा दिये उन्होंने बताया की बेटा बड़े कमज़ोर हो तुम !
सिर्फ़ इस बात पर बुरा मान गये की तुम्हारे जूते फटे होने पर किसी ने तुम्हारा मज़ाक़ बना दिया । हमने तो ज़िन्दगी भर दुख सहे है । राजपूतों की , ब्राह्मणों की , ठेकेदारों की , साहूकारों की सबकी बंधुऑ मज़दूरी की है और इनकी खिल्लीयॉ , ताने और क्रूरता सब हँसते सही है । तुमको इसलिये तो पड़ा रहे है बेटा की ताकी तुम मज़बूत बनो , ताकी तुम वो सब ना सहो जो हमने सहा है । ताकी तुम अव्वल बनो ।
बेटा तुम उनको जबाब दोगे तो क्या होगा ?
कल उनके पिताजी आयेंगे हम लोगों को खरी खोटी सुना के चल देंगे । हम कुछ नहीं कर पायेंगे । जनाब देना है बेटा तो मेहनत कर के दो , तरक़्क़ी कर के दो और उनसे बेहतर बन के दो । ये जबाब तुम्हें हमेशा तरक़्क़ी के रास्ते पे ले जायेगा और एक दिन उन लोगों को अपनी भूल का अहसास होगा ।

मैं उस दिन रात भर नहीं सोया । पिताजी के शब्द मानो कान में गूँज रहे थे । मैंने वो उधड़े हुये जूते तकिये के पास रख दिये थे । शायद प्यार हो गया था उन जूतों से । रात भर ख़्याल करता रहा की बड़ा होकर कुछ बनुगॉ तो नये नये जूते ख़रीदूँगा ।शायद दस साल के बच्चे में जीवन के सत्यार्थ का प्रकाश प्रज्ज्वलित हो रहा था , शायद दस साल के बच्चे में एक गम्भीर मस्तिष्क का जन्म हो रहा था और शायद दस साल के बच्चे में एक बेहतर मानव की रूह का द्वार प्रकट हो रहा था ।

सुबह के वक़्त नींद आ गयी । सात बजे नींद खुली जब मॉ दूध का गिलास ले के आई । मॉ मुस्कुरा रही थी , मेरी तो ऑंख भी अच्छे से नहीं खुली थी तभी मॉ ने कहा की बाहर आ जा तेरे लिये कुछ ख़ास है ।
मैं जैसे ही बाहर गया देखा नये जूतों का डिब्बा रखा हुआ था । मैं चिल्लाया “मेरे लिये है “
मॉ ने कहा , “हॉ कल जो इतना रो रहा था तेरे पिताजी सुबह छ बजे ही लाला से पास गये थे “

मेरे हल्के से ऑसू छलक गये । नये चमचमाते सफ़ेद जूते । मैंने कभी ये भी नहीं पुछा की पिताजी जूते उधार लाये हैं या पैसे देकर । बस पिताजी पर बड़ा गर्व महसूस हो रहा था । फिर कभी ज़िन्दगी में जूतों के लिये ज़िद्द नहीं की , फिर कभी जूतों के लिये नहीं रोया । उन सब लड़कियों को भी दिल से माफ़ कर दिया । बाक़ी ख़ूब संघर्ष किये और पडाई की । फिर बाक़ी की ज़िन्दगी आसान हो गयी । वो उधड़े हुये जूते आज भी संभाल कर रखे है । आज पच्चीस साल हो गये हैं इस वाक्ये को । मेरी बेटी आज दस साल की हो गयी उसी को यह कहानी बता रहा हूँ क्योंकि उसने कभी उधड़े हुये जूते नहीं देखे ।
उसने कभी जाती नहीं देखी । उसे ये जूते दिखा रहा हूँ ताकी वो मेरे मार्मिक जीवन को समझे , ताकी वह हृदय में करुणा बसाये , ताकी वह किसी का हृदय ना तोड़े , ताकी वह किसी उधड़े जूते वाले की खिल्ली न उड़ाये ताकी वह बेहतरीन इंसान बन सके । ताकी वह समझ सके की मेहनत और लगन से सब जबाब दिये जाते है और सफलता से बड़ा कोई ज़बाब ही नहीं है ।

बेटी तुम भी ये जूते संभालना और जब तुम्हारी बिटीया /बेटा दस साल का हो जायेगा तो उसे मेरे महान पिता के बारे में बताना, मेरे बारे में बताना और मेरे उन उधड़े हुये जूतों के बारे में बताना ।

I hope you liked this story. Please do share this story among your friends and spread wisdom and sense of positivity all around. Please follow my blog and share link on whatsapp and Facebook.

Regards- The Lost Monk.

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बुद्ध का धम्म् और अंगूलीमाल

2500 साल पहले मगध राज्य मे ऐक बालक जिसका नाम अंहिसक था वह तक्षशिला मे अपनी शिक्षा दिक्षा ग्रहण कर रहा था । वह अपने सभी मित्रों मे सबसे अव्वल था जिससे जल्द ही वह समस्त आचार्यों का प्रिय हो गया । कुछ छात्र उसकी तरक़्क़ी से इतने दुखी हुये की उन्होंने बालक के प्रति षड्यन्त्र रचा और गुरूजनों को गुमराह कर बालक के ख़िलाफ़ भड़का दिया । गुरूजनों ने उसे दक्षिणा मे ऐक हज़ार मानव अंगुलियों को ऐकत्र करने की दक्षिणी मॉगी जिसके लिये उसे ऐक हज़ार मानव की हत्या करनी थी । वह गुरूकुल से शिक्षा छोड़ कर चला गया और ऐक ऐक करके मानवों की हत्या करता गया । मानव संख्या याद रखने के लिये वह मानव की ऐक अंगुली काट देता था और गले मे माला पहनने लग गया । धीरे धीरे सम्पूर्ण मगध /श्रावस्ती मे उसका ख़ौफ़ फैल गया और कालान्तर मे वह अंगूलीमाल के नाम से कुख्यात हुआ ।

वह हत्याऐं करता गया और करते करते नौ सौ निन्यान्वे हत्याऐ कर गया । अब उसका आख़िरी मानव बचा था और ऐक दिन ऐक बुढ़िया और ऐक सन्यासी जंगल के रास्ते मे उसके सामने आ गये । यह सन्यासी गौतम बुद्ध थे तथा बुढ़िया उसकी अपनी माता थी लेकिन मोह मे अंधा व्यक्ति अंगुलीमाल अपनी मॉ को भी नही पहचान पाया । वह हँसते हुये कहता है “हाहाहा , मेरे रास्ते मे दो लोग ऐक साथ आ गये अब मैं इस बुढ़िया की जान लूँ या इस संन्यासी की “

गौतम बुद्ध मुस्कुराते रहे और बोले , “ इस बूढ़ी औरत की हत्या मत करना , तुम मेरी जान ले सकते हो “

उनके आत्मविश्वास और तेज़ को देखकर अंगुलीमाल अंचभित था और ग़ुस्से मे आकर बोला , “ ऐ संन्यासी , पूरा इलाक़ा मेरे नाम से थरथराता है और तुम्हारी इतनी हिम्मत “

वह ग़ुस्से से उनकी और लपका लेकिन गौतम बुद्ध बिल्कुल निश्चितं खड़े रहे । उन्होंने अपना हाथ आगे किया और बोले , आओ ! और मुस्कुराते रहे ।

बुद्ध के इतने आत्मविश्वास और करूणा देख वह ऐक दम पिघल गया और उसे अपने अस्तित्व का ऐहसास हो गया । बुद्ध ने उसे गले से लगा लिया और धम्म् की शिक्षा दी । वर्षों तक वह बुद्ध के साथ रहा फिर गौतम बुद्ध ने उसे धम्म् की शिक्षा का प्रसार करने के लिये भेज दिया जिससे वह भी दुखियों की सेवा कर सके और उन्हें भी धम्म् का मार्ग प्रशस्त कर सके । वर्षों बाद वह गॉव , शहर की ओर निकला लेकिन लोग क्रोध मे इतने अंधे थे कि वह अंगुलीमाल अपन नही सके और जब भी वह निकलता उस पर पत्थर फेंकते । अंगूलीमाल का सिर फूट जाता लेकिन वह मुस्कुराता रहता क्योंकि वह जानता था ये लोग सब दुखियन है बिल्कुल उसके जैसे है जैसे वह था , इसलिये वह उन्हें सह्रदय अपना लेता बिना किसी अपेक्षा के । लोगों ने उसे अब तक क्षमा नही किया था , गौतम बुद्ध जानते थे वह तैयार था इसलिये उन्होंने उसे वापस भेजा । फिर ऐक दिन किसी गर्भवती महिला की असहाय पीढ़ा को अंगूलीमाल ने अपने तेज़ से , ज्ञान से , करूणा से और धम्म् से ठीक कर दिया । यह बात पूरे शहर मे फैल गयी और लोगों ने अंगूलीमाल को अपनाना शुरू कर दिया ।

बाद मे अंगूलीमाल बेहद प्रसिद्ध बौद्ध हुये और उन्होंने सम्पूर्ण जीवन दुखियन की सेवा की और धम्म् का प्रसार किया ।

शिक्षा – प्रत्येक मनुष्य हजारो कमियाँ और ग़लतियाँ करता है लेकिन यह भी सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य मे ऐक सुप्त अवस्था मे बोधी का भी निवास है । प्रत्येक मनुष्य ऐक बुद्ध है जिस दिन उसकी बोधी का उसे अहसास होता है । जब ऐक कुख्यात हत्यारा भी महान संत बन सकता है तो आप और हम तो अच्छे मानव बन ही सकते है । धम्म् के मार्ग पर चले और दुखियन की सेवा करे ।

Ps – All human beings are rolling into the misery just because of ignorance but their is a way out. Dhamma is the way to understand and experience your own being and real happiness. Everyone is a Buddha and everyone has Boddhi (knowledge) in dormant state. The moment you realise that Boddhi you start feeling compassion for all being and spreading positive vibration all around.

The moment you change your mentality , very next moment you start changing your state. Buddha said , ” All the Buddha before me , all the Buddha contemporary to me and all the Buddha to future , I pay my refuge upon them ”

Buddha is not a name , it is a state of one’s own realisation or ultimate truth . I can be a Buddha, you can be a Buddha and everyone can be a Buddha. Spread positivity and happiness and it will intensify your happiness ten times more back to you. Everyone can change their fate and come out of ignorance. Dhamma is a truth , Dhamma is a law of nature . Be a part of Dhamma and spread Dhamma to serve humanity.

धम्म् शरणम् गच्छामी

संघम शरणम् गच्छामी

बुद्धम् शरणम् गच्छामी ।

🧘‍♂️🧘‍♂️😇😇

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क्रान्ति ( A short story of a thought)

2008 की बात है यशराज और उसका छोटा भाई वीरप्रताप सिंह कॉलेज की छुट्टियाँ ख़त्म करके गॉव से शहर की ओर लौट रहे थे । सुबह सुबह रेलवे स्टेशन पहुँचे । पोष की काली सर्द रात की ठिठुरन मानो इस अंधेरी धुँध के साथ मिलकर प्रकाश के ख़िलाफ़ मानो साज़िशें रच रही हो । अंधेरा कितना ही घना क्यों न हो ऐक छोटी सी प्रकाश की किरण अपने आस पास को ही प्रज्वलित नही करती बल्कि उसकी प्रेरणा तो मानो अनन्त खोयी हुयी भावनाओं को जीवन के खुबसूरत पहलुओं का अहसास कराती है । सुबह के पॉच बजे ट्रेन की छपक – छपक आवाज़ धीमी होती जाती है और धीरे धीरे यह ध्वनि भी मानो प्रकृति की मनोरम ध्वनियो मे खुद को समाहित कर लेती है ।

वीरप्रताप अभी अभी 12 वी पास करके गॉव आया था । यशराज कॉलेज के प्रथम वर्ष मे दार्शनिक विज्ञान की पडाई कर रहा था । यशराज अपने विचारों से प्रभावित करने वाले व्यक्तित्व मे से ऐक था , वह अपने विचारों को सदैव अलग मायनों मे जिन्दा रखना चाहता था । साधारण परिवार मे जन्मे दोनों भाई जीवन के अनुभव को काफ़ी गहराई से समझते थे । उन्हें अहसास था कि ख़ुशियों की क़ीमत क्या है !

उन्हें पता जीवन मे कटुता के अनुभव क्या है !

दोनों भाईयों मे वैचारिक तालमेल ग़ज़ब का था । वे अपने विचारों का आदान प्रदान सहजता से करते थे । पॉच बजे ट्रेन आकर रूकती है तथा क़रीब आधे घण्टे बाहर आकर दोनों टैक्सी का इंतज़ार करते है । सुबह के वक़्त मज़दूरों की बडी भीड़ रहती थी स्टेशन के आसपास । मज़दूरों के झुण्ड ठेकेदारों के इर्द गिर्द मडंराते आसानी से दिखाई देते थे । अभी सुबह के 6 बज गये थे हल्का हल्का उजाला हो गया था । धुँध हट गयी थी , चाय वाले चाय की प्यालियाँ लेकर ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे । चार पॉच झुण्ड मज़दूरों के अलग अलग अपने अपने वाक्या सुलझाने मे लगे थे । तभी पास ही मैं ऐक ठेकेदार , जो कि छ: फ़ुट लम्बा व चमकदार सफ़ेद कुर्ता पहने हुये अपने अग़ल बग़ल अठारह बीस मज़दूरों को धमका रहा था ।

मज़दूर जो की संख्या मे ज़्यादा थे लेकिन मोटे तगड़े ठेकेदार के सामने असहाय महसूस कर रहे थे । मज़दूर हाथ जोड़े कुछ विनती कर रहे थे जबकि ठेकेदार ने हाथ के स्लीव फ़ोल्ड करके कुछ बड़बड़ाये जा रहा था ।

यशराज और वीरप्रताप ने बैग साइड मे रखे और उत्सुकता से दोनों जानने के लिये पास मे पहुँच गये । तभी यशराज ने ऐक मज़दूर से पुछा

यशराज – क्या हुआ भैय्या ? मामला क्या है ?

मज़दूर – अरे बाबू जी ,

ये मालिक हमारा पूरा दिहाडी नही देता है । आधा पैमेण्ट हमेशा रोक देता है । अभी हम सब लोग छुट्टी जाना चाहते है घर को , लेकिन मालिक पूरा पैमेण्ट नही दे रहा है । ऐक महीने का पैमेण्ट रोक रखा है ।

यशराज के हाथो के रौगटे खड़े हो गये । मानो उसके अंदर हलचल हो चली । उसने जो किताबें पड़ी थी , उसने जो उनसे अर्जित किया था वह मानो उसे अन्दर से झकझोरने लगा । उसने लेनिन, चाणक्य और हिटलर के विचारों के पड़ा था। वह जानता था कि हिटलर ऐक ऐसा वक़्ता था कि जब वो बोलने लगता था तो अधमरे घायल सैनिक भी जिन्दा हो उठते थे । वह जानता था कि यह महज़ ऐक विचार मात्र नही है यह विचारो का साम्राज्य है जो आने वाले सहस्र वर्षों तक जिन्दा रहेगा । वह जानता था कैसे विचार व्यक्तित्व परिवर्तित करते है । वह जानता था विचार कैसे चरित्र परिवर्तित करते है ।

यशराज ने चार मज़दूरों को पास बुलाकर कहा

“आप लोग इतने दूर क्यों आये हो , क्या कभी आपने सोचा है ?

क्योंकि आपके पास कुछ नही है तो आप खोने से क्यों डरते है ? आप के पास पहले भी कुछ नही था और आज भी कुछ नही होगा लेकिन बदल सकते हो तो आज दिखा दो कि तुम ताक़तवर हो और तुम जिन्दा हो ।

मिलकर आओ और अपना हक़ छिन लो !

सब मिलकर मारो………..!

अगले ही पल ऐक मज़दूर जूता निकाल के चिल्लाया “मारो”

बस फिर क्या था आवाज़ें गूँजने लगी “मारो साले को “

दो तीन मज़दूर भागे और ठेकेदार को अहसास हो गया की बात हाथ से निकल गयी है । ठेकेदार भाग खड़ा हुआ और उसका जूता पॉव से निकल गया लेकिन पीछे मज़दूरों का झुण्ड भाग रहा था । ठेकेदार गिर पड़ा और मज़दूर उसके ऊपर चड गये । कोई जूता मार रहा था , कोई पॉव घूँसे मार रहा था तभी मज़दूरों मे से ऐक आदमी बीच बचाव करने आ गया । ठेकेदार ने उसके पॉव पकड़ लिये । उसने उसी समय अपने लड़के को फ़ोन किया और सबका पुराना हिसाब चुकता करने का वादा किया ।

यशराज और वीरप्रताप दोनों सब कुछ देख रहे थे तब तक दोनों की टैक्सी आ गयी । दोनों बैठे और चल दिये । यशराज बहुत खुश था इसलिये नही कि उसने कुछ महसूस किया । वह खुश था कि आज उसे अपने पढ़े लिखे होने का अहसास था । आज उसे उन विचारों पर गर्व था जो उसने संग्रहित किये थे । आज उसे अपने हृदय की क्रान्ति पर गर्व था ।

वह रात भर इस वाक्ये को ज़ेहन मे दोहराता रहा । शायद यह अब तक के उसके जीवन का सबसे बेहतरीन वाक्या था । यह सब जो उसने अर्जित किया था , उसका मात्र एक लक्षण भर था । यह उसके विचारों की एक ख़ूबसूरत क्रान्ति थी ।

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A letter to Eve (45 days old puppy)

ईव (Eve) मेरे 45 दिन का जर्मन शेफर्ड Pup पार्वो वायरस का शिकार हुआ है । रोज खेलने वाली ईव ने अचानक खेलना बन्द कर दिया । उसके आसपास जाने से जो काटने को दौड़ती थी उसने चहकना तक बन्द कर दिया । उसको इतनी पीड़ा सहते देख मेरी रूह को रोज़ाना चोट पहुँचती है । काश मैं उसे समझा पाता की मैं उसे कितना चाहता हूँ , काश वो बोल पाती और मैं उसकी तकलीफ़ों से वाक़िफ़ होता , उसके एक एक ऑसू मानो मेरे शरीर का लहू गिरने जैसा है । मुझे नही पता ईव (Eve) तुम इस सब से लड़ पाओगी लेकिन मैं लिखना चाहता हूँ । मैने छोटे छोटे सपने देखे है और तुम उनका ऐक हिस्सा हो । मैं जीवन के बारे मे हो सकता है अलग राय रखता हूँ लेकिन मेरी भावनाएँ बिल्कुल आम है । तुम्हारी तकलीफ़ों को देखकर इतना टूटता हूँ कि मानो मेरे पास कोई जिन्न होता तो मैं तुम्हारे लिये सारी खुशियॉ मॉग लेता ।

पहले दिन तुमको ले कर आया था तो मैने तुम्हें अपने पास सुलाया । ईव (Eve ) यक़ीन मानो मैं रात भर तुमको देखता रहा और जब भी तुमने करवट बदली मैने तुम्हें ओढ़ने के कम्बल परोसा । पहले दिन तुमने 2:39 बजे रात को जगकर आवाज़ें करना शुरू किया । मैने महसूस किया कि तुम कुछ कहना चाहती हो , मैं उठा और लाइट ऑन की । तुमको बालकनी मे ले गया तो तुमने वहॉ पौट्टी की और उसके बाद तुम फिर सोयी ही नही ना मुझे सोने दिया । सुबह रोज पॉच बजे उठ जाना और चूँ चूँ करना मानो ये बताने की कोशिश की उसको भूख लगी है । दस दिन ईव (Eve) तुमने मेरे संग ऐसे बिताये है जैसे तुम उन सबका हिस्सा थी । मैंने तुमको समझना शुरू किया था , कब तुमको भूख लगती है , कब तुमको वाथरूम जाना है सब कुछ समझने लगा हूँ मैं । मैंने दुआएँ कि है ईव (Eve) ब्रह्माण्ड (universe ) से , सृष्टि से की वह तुम्हारी ज़िन्दगी के अंधेरों को ख़त्म कर दे । मैंने दुआएँ कि है कि मैं अपने हिस्से की ख़ुशियाँ तुम्हें बॉट दूँ , ऐ सुदूर बह्रमाण्ड की रहस्यमयी ताक़तों , यदि मेरी फरियादो की गुंजे तुम तक पहुँचती है तो मेरे हिस्से की ख़ुशियाँ बॉट लो और इस नन्ही सी जान को ताक़त दो कि यह लड़ सके , उठ सके , चल सके और जीवन महसूस कर सके ।

ईव (Eve) जीवन बहुत ही अप्रत्याशित है और यहॉ सदैव के लिये जैसा कुछ भी नही । मेरे सपनों मे तुम्हारे साथ पहाड़ों मे घुमना है , यदि मौक़ा मिलेगा तो हम ऐक दिन बर्फ़ वाली जगहों मे जायेंगे और वहॉ मैं तुम्हारे सबसे बेहतरीन फ़ोटो खींचूँगा । ईव (Eve) यदि मौक़ा मिलेगा तो हम साथ में घुमेंगे और मैं तुम्हें बेहतरीन भोजन से रूबरू करवाऊँगा । तुमको कभी अपने हाथो का ब्रेड खिला सकता हूँ मैं और यक़ीन मानो ईव (Eve) मैं अफ़ग़ानी चिकन खिलाऊँगा तो तुम हर दिन डिमाण्ड करोगी लेकिन मैं तुम्हें बिगाड़ूँगॉ नहीं । मैं ऐक छोटा सा बारेबीक्यू लगाऊँगा , कभी कभी रोस्टेड भी ट्राई कर सकते है । अगले साल दिल्ली छोड़ के चलें जायेंगे कही दूर पहाड़ों पर , जहाँ ये भाग दौड़ वाली ज़िन्दगी न हो ।

ईव (Eve ) हम पूरी कोशिश करेंगे कि तुम ठीक हो जाओ । तुम मेरे बेहतरीन सपनों में से एक हो और वह मैं अधूरा नहीं छोड़ना चाहता । मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं रहती , लेकिन तुमसे होगी क्योंकि मैं कहानी लिखना चाहती हूँ , तुम्हारी कहानी । इसलिये तुमको लड़ना होगा , अच्छा होना होगा ताकि हम Bucket list की काफ़ी लम्बी लिस्ट को छोटी करते चले । तुम्हारे साथ के ये दस दिन खुबसूरत है । मैंने बहुत सी विडीयोज बनायी है , बहुत फ़ोटोज खींची है और जब तुम बड़ी हो जाओगी तो मैं दिखाऊँगा कि देखो तुमने ज़िन्दगी की शुरूवात कैसे की है ।

ईव (Eve) मैं दिल से चाहता हूँ कि तुम अच्छी हो जाओ ।मेरे सपने की हिस्सा हो तुम । मुझे ज़रूरत है तुम्हारी और मैं ज़िन्दगी की कुछ बेहतरीन यादें तुम्हारे संग जीना चाहता हूँ । जल्दी अच्छी हो जाओ ईव (Eve ).

Get well soon Eve , I love you with my all heart .

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ईवा

(Chapter -1)

कितना ख़ूबसूरत नाम है ना !

जितना ख़ूबसूरत है उससे कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत तो मतलब है शायद ।

ईवा ! (Life)

जब भी पूछे मुड़कर देखता हूँ तो कहीं ना कहीं याद आ जाती है । आज सालो बाद लिखना शुरू किया सोचा कि आप सभी भी जान लो उस ईवा को जिसे मैं भी जानता था ।

मेरा नाम अहमद है । दिल्ली की ऐक मिडिल क्लास फ़ैमिली से हूँ , अब्बू की कपड़ों की दुकान है चाँदनी चौक मे । बचपन से कोई कमी नही रही जो मॉगा मिल गया और फिर अपनी भी कोई ज़्यादा ऐम्बीशन थी ही नही लाईफ़ मे ।

मेरे मोहल्ले मे दो मकान छोड़ के शर्मा निवास है । उनका लौण्डा है रौनी , मुझसे ऐक क्लास सीनीयर है लेकिन रोज क्रिकेट खेलने आता है I mean देखने आता है खेलता नही । इसी की क्लास मे पड़ती है ईवा । देखने मे सुन्दर , राजकुमारी की तरह लेकिन सब डरते है उससे ।स्कूल की सबसे शैतान लड़की है ।

और रौनी स्कूल का सबसे अच्छा लड़का । मैं तो कहता हूँ रौनी जैसा लौण्डा होना भी दुनिया मे बहुत बड़ी बात है यार । यही वो शर्मा जी का लोण्डा है जिसके बारे मे आप भी बात करते हो । आगे जा के मालूम पड़ेगा आपको ।

मैं तो ईवा मैम से हमेशा बचकर रहता था उनसे नज़र मिलाना मतलब यमराज से ऐपोण्टमैण्ट ले लेना हो । जब भी स्कूल का कोई भी रिज़ल्ट आता रौनी को ही फ़र्स्ट प्राइज़ मिलता । ईवा को इस बात से कोई प्रोब्लम नही थी लेकिन इस बार के ऐनुवल फ़ंक्शन मे रौनी के पैरेन्टस को सम्मानित किया गया तो घर आकर ईवा के पापा ने ईवा को थोडा सुना दिया ।

“ईवा ! देखो राम ने अपने mom dad को कितना प्राउड फ़ील कराया है और तुम्हारे मार्क्स देखो “

शर्मा जी के लड़के से कुछ सीखो ।

ईवा को ये बात ज़रा अच्छी नही लगी । अगले दिन स्कूल मे बाथरूम के पास मैं , रौनी के साथ जा रहा था । ईवा और उसी चार पॉच फ़्रेण्ड्स आकर हमको धक्का देने लगती है ।

रौनी – I will complain

ईवा – साला ! अंग्रेज़ी मे बोलता है । दो चॉटा मारके लम्बा लिटा दिया । दो फ़्रेण्ड ने पैण्ट पकड़ी और उतार दिया ।

पैण्ट छुड़ा के मेरे पास आयी ऐक खींच के तमाचा मारा , आज भी ऑखो मे बिजली चमकती है । दूसरे की ज़रूरत ही नही पड़ी ! हमने खुद ही पैण्ट उतार के दे दी । ऊपर से धमकी दे गई की अगर किसी को बोला तो अगली बार यंत्र काट दूँगी!

बाप रे ! कहॉ फँस गये यार

ये रौनी साला तुम थोड़े कम नम्बर लाते ना हर समय साला किसी ना किसी के *** लगवाते रहते हो ।

दो घण्टे बाथरूम मे बन्द ।

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ख़ैर ईवा की मेहरबानी हुयी पैण्ट मिल गयी और मैं अपनी क्लास चला गया रौनी अपनी क्लास ।स्कूल मे गेम्स प्रैक्टिस हो रही थी पहली बार हमारी स्कूल इण्टर स्टेट स्कूल गैम्स के लिये जयपुर जाने वाली थी । हमारे स्कूल के मर्यादा पुरूषोत्तम राम यानी रौनी को बैस्ट परफ़ार्मर के नाते एंकरिंग का ज़िम्मा था , साथ मे रौनी ऐथलैटिकस मे हिस्सा ले रहा था ।

अगले दिन ईवा , रौनी से न जाने क्या बात कर रही थी । मुझे तो शक हो गया था कि कुछ ना कुछ गड़बड़ चल रहा है । ईवा ने उसको जूस पकाडाया और खुद भी ऐक बोतल से पीने लग गई ।

आधे घण्टे बाद , ब्याइज की 400 m रेस होने वाली थी । रौनी भी लाइन मे लगा था । रेस शुरू हुयी कुछ देर दौड़ने के बाद रौनी सीधे हॉस्टल की तरफ़ भागने लगा । सब हैरान थे अचानक क्या हो गया । रौनी हॉस्टल के मैन रूम तक ही पहुँचा था पीछे हमारा कोच और स्टाफ़ भी ।

ये क्या रौनी ने पूरी पैण्ट ख़राब कर रखी है ।

पैण्ट मे ही हग दिया । बेचारा फीनीश लाइन क्रास ही नही कर पाया ।

उस दिन ऐक बात तो समझ आ गयी की हर शर्मा जी के लौण्डे को ईवा जैसी लड़की ज़रूर मिलती है । पूरे स्कूल मे रौनी के टट्टी वाला मीम चला । ऐड बने लेकिन ऐसे लोगों मे मेहनत करने की जो ठरक होती है ना उसका लेवल ही अलग होता है ।

मेरे ऐग्जाम हो गये रिज़ल्ट आया मैं खुद हैरान की 85 % आ गये । जो लौण्डा नक़ल मारके भी कभी इतने मार्क्स नही ला पाता उसके इतने आ गये । लेकिन अब्बू खुश नही थे ठीक हर टिपीकल इण्डियन डैड के जैसे ।

ख़ैर जैसे तैसे पास हो गया …….!

फिर ज़िन्दगी का नया चैपटर शुरू हो गया !

Continue…………………………..!

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चार सिपाही और चार कहानी

आज सुबह से कुछ मूड सा ख़राब था तो निर्णय लिया कि कुछ युवा लड़कों को बुलवाकर गॉव मे पास की नदी मे जाकर यात्राऐ करेंगे और कुछ जीवन के अनुभवो को साझा करेंगे । चार लोग और हमारी चार कहानियॉ इस प्रकार से है उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आएगी

कहानी १.

इन यात्राओं के दौरान मैंने भी अपने अपने अनुभव साझा किये । ऐक छोटा सा यादगार पल जो हमेशा मेरे ज़ेहन मे आता रहता है । 2004 की बात है मैं दसवीं कक्षा मे पढ़ता था । उत्तराखण्ड बोर्ड के ऐग्जाम थे तो हम सब लोग मेहनत तो करते ही थे । गर्मियो मे ऐग्जाम होने के बाद रिज़ल्ट आने तक 2-3 माह का समय रहता है । पारिवारिक स्थिति अच्छी नही थी और हम पूरा परिवार पिताजी के साथ मिलकर टमाटर की खेती करते थे । जून के प्रथम सप्ताह मे रिज़ल्ट आता था और यह वो दौर था जब मेरे गॉव मे नेटवर्क भी नही होते थे । मैं अपने स्कूलमोट्स के साथ पैदल तीन चार किलोमीटर तक ऐक छोटे से गॉव फेडिज तक गया । वहॉ पहुँचते पहुँचते हिमाचल के फ़ोन टावर्स आते थे । हम लोग बहुत उत्तेजित थे अपने रिज़ल्ट को ले के और डर भी लग कहा था क्योंकि ये वो वक़्त था जब गॉव मे फ़र्स्ट डिवीज़न को भी तीसमार ख़ॉ समझा जाता था ।

फेडिज पुल पहुँचते ही देहरादून मे रहने वाले भैय्या लोगों को कॉल आया सबका रिज़ल्ट पता चला । हम सारे दोस्त पास थे और मेरे 74.82 % थे जो कि हमारे ब्लॉक से उस वक़्त सर्वाधिक थे । हम सब लोग बहुत ज़ोर ज़ोर से चिल्लाऐ , पूरी ताक़त के साथ । सारे बचपन के दोस्त इतने खुश थे जितने शायद आज तक कभी नही हुये । हम लोग मार्केट आये सबको बताया और गॉव मे उस वक़्त फिस्ट का चलन था , जो पास हो जाता था वह ख़ुशी से मोहल्ले मे मिठायी बॉटता था ।

मैं भी बहुत खुश था , भागता हुआ घर गया । पिताजी ने तब तक टमाटर की सिंचाई के लिये नल लगा दिया था । मैने अपने पिता को बताया की मैने टॉप किया है और फिस्ट के लिये पचास रूपये भी मॉगे । मेरे पिता बहुत खुश हुये उन्होंने वो पचास रूपये निकाले और बोला

“बेटा हम पूरी साल मेहनत करते है , तुम्हारे पास ऐसा कुछ नही है जो तुम अपने मॉ बाप को दे सकते हो । हमे पूरे साल इस बात का इन्तज़ार रहता है कि ऐक दिन ऐसा आएगा जब मेरे बच्चे मुझे गिफ़्ट देंगे । बस यही तोहफ़ा था जो तुम दे सकते हो और वो आज तुमने दे दिये , शाबाश बेटा “

मेरी ऑंखें शायद आज भी थोड़ी सी नम हो जाती है इन पलो को याद करके ।

शिक्षा – यदि तुम स्टूडेण्ट्स हो तो इस छोटी सी बात को गहराई से समझो और अपने मॉ बाप को तोहफ़ा देने की कोशिश करो।

कहानी २.

आज मेरे छोटे भाई ने मेरे साथ जीवन के कुछ बेहतरीन पलो के बारे मे बताया । वह कहानी मे यहॉ आपके साथ शेयर कर रहा हूँ ।

रमन जब 11th मे पड़ता था तो उसकी तबियत बेहद ख़राब रहा करती थी जिसकी वजह से उसके छमाही इम्तिहान मे काफ़ी कम मार्क्स आये ।

रमन को अपने इस दौर मे बेहद तनाव का सामना करना पड़ा यहॉ तक कि जब वह अपने गुरूजनों से भी अपने बारे मे कुछ नकारात्मक सुनता तो उसका मन और दुखी हो जाता ।

जनवरी का महीना भी निकल गया रमन के पास मात्र अब ऐक माह बचा था फ़रवरी का क्योंकि मार्च से बोर्ड के ऐग्जाम भी आने वाले थे । रमन ने निर्णय लिया कि वह मेहनत करेगा और अपने बारे मे उड़ रही सभी नकारात्मकता को ख़त्म करेगा । रमन ने टाईम टेबल फ़िक्स किया , सिलेबस को टेबल पर लगाया और उन फ़रवरी के 28 दिनों मे 10-12 घण्टे लगातार मेहनत कर 11th की परिक्षा 86% अंकों से प्राप्त की ।

रमन की यह कहानी उसे हमेशा प्रेरणा देती है आगे बडने की । आज यह कहानी उसने हमे शेयर की मैं आप सब लोगों को शेयर कर रहा हूँ ।

शिक्षा – जीवन उतार चडावो का दौर है लेकिन दृढ़ निश्चय और कठिन परिश्रम सदैव विजयी होता है ।

कहानी ३.

प्रियाशूं , मेरा भॉजा जो अभी गॉव के स्कूल मे ही 12th मे अध्धयनरत है । आज उसके साथ भी यात्रा करने का मौक़ा मिला और उसकी कहानी सुनने का भी ।

दो साल पहले की बात है उसके गॉव क्वानू के ही ऐक ड्राइवर राजू का आना जाना अटाल ऐवम सैंज लगा रहता था । प्रियाशूं दसवीं पास कर चूका था तो वह अक्सर राजू के साथ गाड़ी मे लटक जाया करता था । हालाँकि ताऊ जी (उसके नाना जी ) हमेशा उसे डाँटते थे की तुम पड़ने आये हो ना की गाड़ी मे लोफरपंथी करने लेकिन युवा प्रियाशूं को इन बातो से कोई सरोकार ना था ।

ऐक दिन सुबह सुबह राजू गाड़ी मे सवारी भर के सैंज चला गया । राजू की गाड़ी देख प्रियाशूं भी उसमे लटक गया और सवारी को गॉव छोड़ने के बाद जब राजू गाड़ी वापस रिवर्स कर रहा रहा था तो अचानक गाड़ी पलट गयी लेकिन रोड गॉव के पास होने की वजह से खायी मे वही गयी । किसी को कोई नुक़सान नही हुआ लेकिन इस कटू अनुभव ने प्रियांशु की जीवन मे गहरा प्रभाव डाला अब वह बेवजह फ़ालतू नही घूमता है ।

इस शानदार अनुभव को शेयर करने के लिये धन्यवाद भान्जू ।

शिक्षा – जीवन बहुमूल्य है इसकी क़ीमत पहचानिये , व्यर्थ मे जीवन व्यतीत न करे ।

कहानी ४.

अनिकेत राणा , जो कि रिश्ते मे मेरे चाचा लगते है ।आज उनके साथ यात्रा करने का अवसर मिला । उन्होंने अपने कुछ बेहतरीन पलो को साधा किया । पिछली साल गर्मियो का मौसम था । अनीकेत दो चार अन्य लोगों के साथ डायनामेंट लेकर मछली मारने के लिये गॉवो मे बहने छोटी नदी पर चला गया । गर्मियो के दिनों मे अक्सर लोग नदी मे मछली मारने जाया करते है । अनिकेत और तीन अन्य लोग नदी पहुँच कर डायनामेंट तैयार करने मे लग गये । डायनामेंट फोड़ा गया और ख़ूब मछलियाँ भी मील रही थी । अचानक अनीकेत को ऐक बड़ी सी मछली दिखायी दि , अनिकेत ने तुरन्त ही गोता लगाया और मछली की तरफ़ झपटा किन्तु मछली दो छोटे पत्थरों के अन्दर फँसी हुयी थी । अनिकेत ने हाथ डाला , काई वग़ैरह होने की वजह से हाथ अन्दर तो चला गया किन्तु वापस निकलते हुये फस गया , उसने बहुत कोशिश की लेकिन हाथ नही छूटा । थोड़े समय बाद पानी उसके मुँह मे चला गया और वह छटपटाने लगा उसको लगा जैसे यह उसका आख़िरी दिन हो जैसे लेकिन उसने आख़िरी झटका दिया और हाथ छिटक गया । बाहर निकलते ही उसे उल्टीयॉ हुयी लेकिन साथ वालों को किसी को पता नही चला क्योंकि वो लोग मछली पकड़ने मे व्यस्त थे । इसके बाद अनिकेत ने यह समझ लिया की ज़िन्दगी का कुछ भी भरोसा नही है और वह हमेशा सकारात्मक सोच रखने लग गया ।

इस बेहतरीन अनुभव को साझा करने के लिये शुक्रिया अनिकेत चाचा जी ❣️😊

शिक्षा – धैर्य जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है , कठिन से कठिन समय मे भी ऐक अन्तिम प्रयास अवश्य करना चाहिये ।

…………………………………धन्यवाद ……………………………………………………………………

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कर्म (a moral story)

(यह ऐक छोटी सी कहानी है जो बचपन की उन बेहतरीन कहानियों मे से ऐक है जिसने मेरे जीवन को बेहद प्रभावित किया है , इसको रचनात्मकता देने के लिये ऐक ताना बाना बुना गया है , उम्मीद है कि यह कहानी सदैव जिन्दा रहेगी – thelostmonk)

सुदूर पहाड़ों की घाटी और यमुना नदी के किंनारे बसा अलीगंज मात्र 50-60 परिवारों का यह गॉव ख़ुशहाली और विकास का यश ऐसे फैला रहा था जैसे यमुना का अविरल जल अपनी निरन्तरता । अलीगंज भी सभी प्रकार के लोगों से मिश्रित गॉव था जो सभी थोड़े ग़रीब , थोड़े अमीर प्रकार की आर्थिक परिस्थितियॉ सम्मिलित किये हुये था। यहॉ मुख्य व्यवसाय कृषि था लेकिन यमुना की तलवार सरीखी धार पहाड़ों को चीरती हुयी जो कण कण अपने साथ लेकर चलती है उसकी मूल्यवान रेत का भी व्यवसाय ज़ोरों पर था ।लेकिन गॉव में ज़्यादातर लोग बेहद ग़रीब थे तो संसाधनों पर केवल , कुछ आर्थिक रूप से मज़बूत परिवारों का ही हाथ था ।रेत का कारोबार व्यक्ति की प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता था जिसके पास जितने ज़्यादा घोड़े उसकी उतनी ही ज़्यादा प्रतिष्ठा , हालाँकि गधो को भी प्रयोग में लाया जाता था लेकिन गधो का प्रयोग करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था ।

मोहम्मद एक बेहद ग़रीब परिवार से सम्बन्ध रखता था , उसके पॉच बच्चे थे और वह मेहनत मज़दूरी कर ही बच्चो का पेट पालता था । वहीं उसके कच्चे मकान से दस बारह गज पठान रहता था जो आर्थिक और पारिवारिक रूप से बेहद मज़बूत था । पठान के पास चार घोड़े थे जो कि पूरे दिन रेत को ढोने का काम करते रहते थे । पठान का व्यक्तित्व पहले से ही बेहद रूखा था लेकिन पुश्तैनी सम्पत्ति उसके पास थी वह ऊँचे कुल में पैदा हुआ था उसका रूतबा पहले से ही था । वह कई दफ़ा मज़दूरों और कारीगरों से रूखा व्यवहार करता था । वह धार्मिक तो था और नमाज़ पड़ने का भी पाबन्द था ।

मोहम्मद बेहद ग़रीबी में जी रहा था लेकिन उसके चेहरे पर कभी भी निराशा नज़र नहीं आती थी । उसने मज़दूरी कर कर के चन्द पैसों का इन्तज़ाम किया और ऐक छोटा गधा ख़रीदा। वह पठान के यहॉ मज़दूरी करता था तो पठान को बताता की कुछ वक़्त मे जब उसका गधा भी काम लायक हो जायेगा तो वह भी रेत का काम शुरू करेगा । पठान को यह सब अच्छा नही लगता था और वह मोहम्मद को नीचा दिखाने के लिये अन्य मज़दूरों के सामने रूखा व्यवहार करता था , तरह तरह के ताने मारता था लेकिन मोहम्मद हँसते हँसते फिर अपने काम मे लग जाता । थका हारा मोहम्मद घर लौटता तो अच्छे चारे वगैरह से अपने गधे का ख़याल रखता व पालन पोषण करता । महीनों दो महीनों में उसका असर दिखने लग गया वह गधा तगड़ा होने लग गया और तेज़ी से बड़ता हुआ दिखाई देने लग गया । पठान भी यह देखता तो उससे रहा नहीं गया , मन ही मन उसे ईर्ष्या हो जाती । वह सोचता की कहीं यह भी उसकी बराबरी ना कर बैठे , उसके जैसे रोबदार ना बन जाये तो वह बस परेशान हो जाता । उधर मोहम्मद बेहद शान्त ऐवम सरल क़िस्म का व्यक्ति जो सिर्फ़ पठान के जैसे बनने की चाहत रखता था वह भी चाहता था की वह भी पठान के जैसे तरक़्क़ी करे ।

वह हमेशा पठान से चीज़ें पूछता और जानने की कोशिश करता । मोहम्मद उसे अपने सपने भी बताता तो उसका यह महत्वाकांक्षी होना भी पठान को बुरा लगता । फिर जैसे जैसे मोहम्मद का गधा भी सालभर में तैयार हो गया तो मोहम्मद ने उसे काम पर लगाना शुरू कर दिया । मोहम्मद बेहद प्रेम से देखभाल करता , दिन भर की थकान के बाद हरा हरा चारा और पानी देता । इस तरह उसका जीवन भी पटरी पर उतर गया और वह अपने जीवन को और बेहतर बनाने के लिये हर सम्भव कोशिश करने लग गया । उसने कमायी का कुछ प्रतिशत बचाना शुरू किया और जब पर्याप्त धन हो गया तो ऐक और गधा भी ले लिया ।

पठान तो नमाज़ , मज़ार , दान पुण्य सब चीज़ें करता था ताकि उसकी छवि उसके व्यापार को बढ़ावा दे सके लेकिन चरित्र मे उसके जो ईर्ष्या का दामन था वो तो मानो उसकी आत्मा से लिपटा था । वह सदैव मन मे अल्लाह ताला से दुआ करता कि मोहम्मद के गधे मर जाये तो वह उसकी बराबरी कभी नही कर पायेगा । लेकिन मोहम्मद अपने आप मे ही व्यस्त , सब चीज़ों से अनभिज्ञ था कि पठान उसकी तरक़्क़ी से इतना आहत है ।

मोहम्मद का काम तो चल पड़ा , अब पठान के व्यापार पे भी असर तो पड़ा ही था धीरे धीरे मोहम्मद का नाम और काम सबको पसंद आ गया और मोहम्मद की मेहनत व लगन और उसका निष्पक्ष , निश्छल रवैये ने उसके और तरक़्क़ी प्रदान की । उसका कच्चा मकान , अब पक्का व रंगीन हो गया । उसके बच्चे उन स्कूलों मे दाख़िल हो गये जिनमें पठान के बच्चे थे । पठान रोज की नमाज़ मे दुआ फ़रमाता की मोहम्मद के गधे मर जाये तो उसकी हर फ़रियाद पूरी हो जायेगी ।

ऐक दिन तेज़ मूसलाधार बारिश हुयी और पठान के अस्तबल मे बिजली गिरी , उसके चारों घोड़े मारे गये , उसका बहुत नुक़सान हुआ । पठान तो मानो टूट गया और आज उसको मानो बदन मे कम्पकंपी की तंरगे दौड़ रही हो । वह आज की नमाज़ अदा करने के लिये मस्जिद पंहुचा ।शान्ति से ऐक गहरी सॉस ली दुआओं के हाथ पसारे और बोला

“या खुदा ! बहुत की दिल से खुदा-ई

लेकिन तुझे गधे घोड़े की पहचान न आयी “

जब वापस पंहुचा मोहम्मद उसके घर के आगे था और उसने पठान से कहा ,

पठान भाई ये पॉच हज़ार रख लो और नया घोड़ा ले लेना , मैने भी घोड़े के लिये रखे थे कि कभी नये घोड़े ख़रीद पॉऊगॉ लेकिन आपके साथ वक़्त ने अनहोनी कर दी । आप इसे रख लीजिये तब वापस दे देना जब आप को सही लगे ।

पठान निशब्द था , ऑसुओं की धारा ऐसे फूट पड़ी मानो कोई झरना अपनी ताक़त का प्रदर्शन करना चाहता हो । वह मोहम्मद से लिपट गया और कुछ नही बोला । शायद बहुत कुछ था अन्दर लेकिन ये उसका ऐसा अहसास था मानो उसको कोई खुदा मिल गया हो ।

(Moral – You can create reputation but to built character you need a kind heart )

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धारा

मेरा नाम धारा है और ये मेरी कहानी है ।मैं ऐक मध्यम परिवार की लड़की हूँ । मेरा घर छोटे से शहर देहरादून मे है ।मेरे पिता बैंक मे नौकरी करते है और मॉ गृहिणी है । मेरा ऐक छोटा भाई है ।बचपन से परिवार मे लाड़ली रही हूँ । मेरे चचेरे भाईयों की भी मैं इकलौती बहन हूँ । पिता की ट्रान्सफर की वजह से बचपन से ही नयी नयी जगहों पर जाने का मौक़ा मिला । स्कूल के दिनों मे मैं पडाई मे उतनी इण्टेलीजेन्ट नही थी लेकिन मेरा छोटा भाई सोनू बहुत इण्टेलीजेण्ट था । वह हमेशा 90+ स्कोर करता था लेकिन मेरे मार्क्स 70 के आस पास ही अटक जाते थे । मुझे ऐक बार मे समझ ही नही आता था , चार चार बार पड़ती थी तब जाकर कहीं समझ आता था । 12th के बाद bio नही लेना चाहती थी लेकिन पिता का सपना था मे डाक्टर बनू और बेटा इंजीनीयर । हर भारतीय मध्यम वर्गीय परिवार का बस यही सपना होता है । ख़ैर उनकी आरजूओ के सामने खुद को असहाय पाया और कोचिगं ज्वाइन कर ली । लेकिन फ़ीजिक्स और कैमिस्ट्री सर के ऊपर जाती थी लेकिन मैं फ़ेल होने से इतना डरती थी कि मेरे मन मे ये ख़्याल आते थे कि कही मेरे और सोनू के बीच कोई तुलना ना करे । मैं मॉ बाप को ये बोलते नही सुनना चाहती थी कि उनकी बेटी नालायक है । मैने बहुत मेहनत की और रिज़ल्ट मेरे मुताबिक़ आया । मेरा चयन दिल्ली के ऐक मेडिकल कॉलेज मे हो गया । कॉलेज ज्वाइन करने के बाद भी मुझे दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा । कॉलेज मे भी मुझे समझ नही आता था , घर मे नही बोल सकती थी , कुछ बच्चे शुरूवात के ही दिनों मे कॉलेज छोड़ कर जा चुके थे ।फ़र्स्ट ट्रम ऐग्जाम हुये तो ऐनाटॉमी मे 50 मे से मात्र 2 मार्क्स आये तो घर आकर बहुत रोयी । घर पर नही बता सकती थी कि मुझे समझ नही आता है , डर लगता था कही पापा ये न कहे कि मैं नालायक हूँ , कहीं उनके सपने न टूट जाये , कही उनका दिल न दुखे । या फिर ये न कहे कि तेरा भाई इतना इण्टेलीजेन्ट है और तू कॉलेज छोड़ के आ गयी ।मैने और मेहनत करना शुरू किया , सब कुछ छोड़ के मैने बस पडाई मे ध्यान लगाया । मैं देखने मे ठीक ठाक हूँ तो मुझे हमेशा से अंटेन्शन मिलता रहता था । स्कूल के दिनों से ही मेरे चाहने वालों की लम्बी लाइन थी लेकिन मैने कभी इस चीज़ को सीरीयसली नही लिया । कभी कभी ये देखकर खुश भी होती थी आख़िर मुझे भी सजना ,संवरना अच्छा लगता था , मैं भी लड़की हूँ हर लड़की की तरह मेरे भी सपने थे किसी राजकुमार के । लेकिन मेडिकल की पडाई का बोझ इतना हावी हो गया कि मैं बस किताबो मे ही गुम हो गयी । इनको ही अपनी आशिक़ी बना डाली और कॉलेज मे कौन मुझे देख रहा है इस बात का कभी अहसास तक नही किया बस पडाई की ,मेहनत की । फ़र्स्ट ईयर के ऐग्जाम तक आने तक इतनी पडाई की ,कि मुझे ये भी याद हो गया कि कौन सा शब्द किस पेज पर है ।मेहनत करने से , लगातार प्रयास करने से परिणाम कितने अलग आते है उसका एहसास तब हुआ जब रिज़ल्ट आया । जिस ऐनाटॉमी मे मात्र 2 मार्क्स आये उसमे 84% आये जो पूरी यूनिवर्सिटी मे सबसे ज़्यादा थे। मैं खुश थी और मेरा स्कोर भी अच्छा था । मैं क्लास की चुनिन्दा उन लड़कियों शामिल थी जो अच्छी लड़कियों मे गिनी जाती थी । मैने अपनी कुछ हॉबीज भी डिवलेप की जैसे मैने ख़ाली समय मे ब्लाग लिखना शुरू किया । मैने स्केटिंग करना शुरू किया और गिटार सिखना भी शुरू किया । मैने बिना किसी कोचिंग से काफ़ी अच्छे स्कैचिगं सीख ली और थोडा बहुत गिटार बजाना भी सीख लिया । अब मेरे सपनों की ये छोटी सी दुनिया थी जहॉ मेरे सपनों का राजकुमार बहुत पीछे छूट गया । मैं अपनी पडाई और हॉबीज मे इतना रम गयी की पता ही मही चला की समय कैसे व्यतीत होता चला गया ।फिर धीरे धीरे मेरा रुझान और बढ़ गया पडाई को लेकर ।पॉच साल कैसे बीत गये पता ही नही चला । डिग्री पूरी हुई तो मेरी रैंक पूरी यूनीवर्सीटी मे चौथी थी । ऐक साधारण से दिमाग़ वाली लड़की अब बिल्कुल बदल गयी थी । मेरे माता पिता को मेरी उपलब्धि पर गर्व था । मैं कालेज के बाद आगे की पडाई जारी रखना चाहती थी लेकिन इसी बीच मेरे दूर के रिश्तेदार ने ऐक लड़के का रिश्ता भेजा । लड़के का नाम राहुल था वह आई० आई० टी से इंजीनीयर और आई० आई० ऐम अहमदाबाद से ऐम०बी०ऐ० था । घर मे बात पहुँची तो इतना बड़ा रिश्ता होने की वजह से ऐक मध्यम वर्गीय परिवार कभी नही गवाऐंगा और ऊपर से उसकी अच्छी नौकरी भी थी , अच्छा ख़ासा कमाने वाला था । पिता ने मुझसे जाने वग़ैर हॉ कर दी । मेरे ऊपर दबाब बनाया गया कि इतना बड़ा ख़ानदान है , लड़का इतना कमाता है और ऐसा रिश्ता कभी नही मिलेगा वग़ैरह वग़ैरह ।

ऐक बार फिर मेरे सामने माता पिता के सपने आ गये । वो इतने खुश थे कि मुझे हॉ करनी पड़ी । सुकून की बात ये थी कि राहुल बहुत हैण्डसम लड़का था । मेरे सपने जो बचपन के राजकुमार के कहीं खो से गये थे मैं उनको राहुल मे तलाशने की उम्मीद करने लगी । ख़ैर मैने सपने बुनना शुरू कर दिया । मैं खुश थी क्योंकि सब लोग बोलते थे की राहुल और धारा की जोड़ी दुनिया की बेस्ट जोड़ी होगी ।

(धारा की ऐक स्कैचिंग जो 2014 मे बनायी )

ख़ुशी ख़ुशी 2014 मे हमारी शादी हो गयी । मैं बहुत खुश थी । पापा ने हमे कुछ पैसे भी दिये थे ताकि मुझे कभी कोई दिक़्क़त महसूस ना हो । मैं देहरादून मे ही थी , राहुल इंदौर मे था । शादी के कुछ दिनों बाद मैं राहुल के साथ इंदौर चली गयी । बस कुछ ही दिन हुये थे राहुल छोटी छोटी बातों पर डाँटना शुरू कर देता था । हर पती पत्नी मे लड़ाईयॉ होती है लेकिन हम छोटी छोटी बातो को लेकर ही लड़ने लग जाते थे ।2-3 महीने ऐसे ही चलता रहा , मैं राहुल को बदलते व्यवहार को समझ नही पा रही थी । फिर उसने मुझे सास ससुर के पास देहरादून छोड़ दिया । मैं नौकरी करना चाहती थी लेकिन राहुल नही चाहता था की मैं नौकरी करूँ । ख़ैर मैं सास ससुर के पास रही और मुझे तो खाना बनाना भी नही आता था , धीरे धीरे सब काम सीखा और उनकी सेवा की ।मैं चुप रहती थी और सोचती अगर राहुल मुझसे दूर रहकर खुश है तो ऐसा ही सही । 2-3 महीने हो गये लेकिन राहुल ने कोई सुध नही ली लेकिन जब घर वालों का प्रेशर पड़ा तो राहुल मुझे लेने आ गया । मुझे लगा की अब राहुल थोडा सा बदल गया होगा । लेकिन वह शायद खुश नही दिख रहा था । हमने ज़्यादा बातचीत नही की और इंदौर आ गये लेकिन फिर वही सब शुरू हो गया । वह छोटी छोटी बातो मे मुझे डिमोरिलाइज कर देता था । फिर वही हुआ उसने मुझे फिर देहरादून छोड़ दिया । मैं अंदर से टूट गयी थी , मैं घर वालों को नही बताया मैं नही चाहती थी की उनको कोई टेनंशन हो जाये । मैने अपने लिये जॉब तलाशना शुरू कर दिया । इसी बीच राहुल गुड़गाँव शिफ़्ट हो गया । मैने भी अपने लिये गुड़गाँव मे नौकरी ढूँढ ली और राहुल से पूछा कि मुझे आना चाहिये ?

उसने मना किया लेकिन मैं फिर भी गयी लेकिन उसने क्या किया कि वह गुड़गाँव से शिफ़्ट होकर अपनी चचेरी बहन के यहॉ दिल्ली मे विश्वविघालय शिफ़्ट हो गया ।दिसम्बर का महीना था मुझे भी दीदी के यहॉ आना पड़ा । मुझे ठण्ड बहुत लगती है और मैने जब आफिस जाना शुरू किया तो सुबह पॉच बजे उठकर तैयार होना पड़ता था । दिसम्बर मे दिल्ली की सर्दी मे सुबह पॉच बजे उठकर निकलना और रात को साढ़े नौ बजे घर पहुँचना । ये शब्दों मे ब्यॉ नही किया जा सकता। राहुल का मेरे साथ तो रिश्ता बदतर हो गया था अब वह रात भर कज़िन बातें करते रहते और मैं ठीक से सो भी नही पाती । वह जानबूझकर ऐसा करने लग गया ताकी मैं वापस चली जाऊँ , मैने छ: महीने तक ऐसी ही परिस्थितियों मे काम किया फिर मेरी जॉब छुड़वा दी । बाद मे मैने राहुल से पूछा कि मुझे ऐक डिप्लोमा करना है लेकिन राहुल ने साफ़ मना कर दिया ।यहॉ तक की उसने मेरी पडाई और स्टडीज़ , मेरे परिवार के बारे मे भी भला बुरा कहा । मैने अपना सामान उठाया , मैं पॉच बजे निकली थी , राहुल ने ऐक बार भी कॉल नही की ना कोई मैसेज किया ।मैं रात के 9 बजे तक इंतज़ार किया मुझे लगा कि शायद लेने आ जायेंगे ।लेकिन नही आये तो मैं घर वापस आ गयी ।बाद मे पापा ने मुझे डिप्लोमा करवाया ।चार महीनों तक अलग रही लेकिन राहुल ने कभी कोई कॉन्टैक्ट् नही किया ना उसकी फ़ैमिली ने । बाद मैं मुझे लगा कि मेरी ग़लती है शायद कुछ कमी रह गयी है । मैने सामान पैक किया और उसके पास वापस आ गयी ।मैं नयी उम्मीद के साथ उसका दिल जीतना चाहती थी ।लेकिन उस दिन के बाद राहुल ने मुझे मानसिक तौर पर प्रताड़ित करना शुरू किया ताकि मैं कुछ ऐसा क़दम उठाऊँ कि वापस चली जाऊँ ।मैं ग़लती करने से भी डरने लग गयी पता नही कौन सी बात पर राहुल ग़ुस्सा कर दे ।अब वह छोटी छोटी बातो को भी अपनी मॉ और बहनों से शेयर करने लग गया और फिर वो मुझे डाँटते थे ।मुझे तो अपनी ग़लती का भी पता नही होता था । मैं जॉब ढूँढ रही थी तो वो साफ़ मना कर देते थे कि यहॉ पैसे कम है, यहॉ टाइमिग् सही नही है वग़ैरह वग़ैरह । अब महीने तक हो जाते थे कि हमारी बात नही होती थी । लेकिन मैं हारकर सॉरी बोल देती थी इतना गिरा (low) महसूस करती थी और आत्मविश्वास तो ग़ायब हो गया था ।मुझे अब खुद पर भी भरोसा नही था , क्योंकि राहुल मुझे कई बार ऐसा महसूस करवाते थे कि मुझे कुछ नही आता और मैं किसी लायक ही नही हूँ ।वह इस तरह से बात करते थे कि शक्ल देखी है अपनी कभी …..। इससे मेरे अन्दर का आत्मविश्वास डगमगा गया ।मेरी जो सैलेरी मिलती थी उसके ऐक ऐक पैसे का राहुल हिसाब मॉगता थे , और अपनी सैलेरी आज तक कभी बताई भी नही ।इतना सब होने के बाद भी मैं घर मे नही बता पायी और राहुल शक करते थे कि कहीं मैने कोई बात अपने घर तो नही बता दी ।

हर दिन ऐसा ही चलता था मैं इतनी डिप्रेशन मे चली गयी की मुझे बुरे ख़्याल आने लग गये । मैं किसी से शेयर नही कर पाती थी । मुझे कई बार आत्महत्या के ख्याल आये । लेकिन खुद को रोक देती थी । ऐक दिन मैं इन सब चीज़ों से इतना परेशान हो गयी कि मैने हाथ काट दिया ।राहुल भागा भागा मुझे हॉस्पिटल ले गया । वह रोने लग गया और उसने कहा की मेरे वगैर कैसे जियेगा , उसने मेरा हाथ थामकर एहसास कराया कि वह मुझसे कितनी मोहब्बत करता है । रात भर प्यार से बात की । अगले दिन घर वापिस आ गये । राहुल का व्यवहार ऐक दम बदला हुआ था । उसने मुझे इतने प्यार से ट्रीट किया कि मुझे लगा कि अब सब ठीक हो जायेगा । फिर चार पॉच दिन बाद उसने कहा कि हम कुछ दिनों के लिये देहरादून चलते है । मैं 5 अगस्त 2017 को उसके साथ देहरादून आ गयी । उसने मुझे अपने घर की बजाय मेरे घर छेड़ा और खुद यह कहकर वापस आ गया कि वह 2-3 दिन मे वापस आ जायेगा । 7 अगस्त को मॉ ने राखी के दिन मेरे हाथो की पट्टीयॉ देख ली लेकिन मैने कहा गेट मे लग गयी ।

लेकिन उनको शक हुआ तो उन्होंने राहुल को कॉल किया , राहुल ने सब बताकर यह कह दिया की अब वापस मत भेजना । उसके मॉ बाप ने भी यही कहा ।

7-8 महीने बाद वह डिवोर्स पेपर के साथ आया । पापा ने उससे कारण जानना चाहा तो उसने मेरे चरित्र को लेकर सवाल उठाये वग़ैरह वग़ैरह ।मेरे पिता ने क़ानूनी कार्यवाही करनी चाही लेकिन मैने मना तर दिया ।मैं सिर्फ़ ऐक जोड़ी कपड़े के साथ वापस आयी । मैं अन्दर से इतना टूट गयी की मुझे कोई उम्मीद नज़र नही आती । आज मेरी उम्र 30 साल है और 5 अगस्त को हमे अलग हुये ऐक साल हो गया है । मैने इस ऐक साल मे अपनी आत्मग्लानि को महसूस किया कि मैं सब कुछ भूल कर ऐक कायरतापूर्ण क़दम उठा रही थी वो भी उस आदमी के लिये जो मुझे डिजर्व ही नही करता ।

मैने ऐक क्लीनिक मे काम करना शुरू किया और पडाई फिर से जारी करनी शुरू कर दी । मैने अपने आप को हील किया और मज़बूत बनाने का प्रयास किया ताकि मैं लड़ सकू अपनी बूरी यादों से ।

मैं ये कहानी इसलिये शेयर कर रही हूँ कि जब मैं इतना पड़ लिखकर इस दौर से गुजर चुकी हूँ तो सोचिये भारत मे रहने वाली उन दूरदराज़ की महिलाओं के साथ क्या क्या नही होता होगा ।मैं वापस अपनी दुनिया मे लौट गयी कितनी धारा ऐसी होगी जो कभी उबर नही पाती होगी !

यही सब बातें ज़ेहन मे बार बार मुझे झकझोर देती है । मैंने अभी ऐक दो गॉवर्नमेंट के ऐग्जाम निकाले है इंतज़ार कर रही हूँ कि इण्टरव्यू भी अच्छा हो जाये । शायद किसी की दुआ काम आ जाये और राहुल का फ़ैसला बाद मे डिसाइड करूँगी ।