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अनकही ………Lalit Hinrek

अनकही

जो उकेरती थी ज़ेहन के ख़्वाबों को ,

वो तख्ती वो स्याही कहीं गुम हो गयी ।

जो बुनते थे आवारा परिन्दों के सपने ,

आवारगी 🌸💫

वो मिट्टी , वो बर्तन कहीं खो से गये ।

उन सपने से ख़ुद को हँसाने की चाहत ,

हिसाबों की उलझन में कहीं खो सी गयी ।

जो उकेरती थी ज़ेहन के ख़्वाबों को ,

वो तख्ती वो स्याही कहीं गुम हो गयी ।

कहानियों में देखी वो सच्ची मोहब्बत ,

किताबों के पन्नों से गुम हो गयी ।

वो दोस्ती , वो यारी , वो रिश्तों की रौनक़ ,

दूरियों मजबूरियो से धुमिल हो गयी।

जो उकेरती थी ज़ेहन के ख़्वाबों को ,

वो तख्ती, वो स्याही कहीं गुम हो गयी !

By The Lost Monk

Writer || Poet || Explorer || Photographer || Engineer || Corporate Investigator || Motivator

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