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दरिया (EP-1)

If you find my stories dirty , the society you are living in is dirty ~ Munto

कई कहानियाँ दिल को छू जाती है । क्या पता यह आपके दिल को छू जाऐ । यह कहानी मेरे मित्र द्वारा सुनायी गयी जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है । ये कहानी है रिश्तों की , मोहब्बत की , ख़ुशी की और ज़िन्दगी के मायनों की ।

कहानी शुरू करते है मेरा नाम सागर है । मेरे पूर्वज कुमाऊँ हिमालय के अल्मोडा ज़िले के बाशिंदे थे जो रोज़ी रोटी की तलाश मे 1978 मे मुंम्बई आ गये थे । मैं उस वक़्त मात्र 5 साल का था । मेरे पिता के साथ साथ मेरी मॉ , मेरी बहन , मेरे चाचा चाची और उनके दो बच्चे भी साथ आये थे । गॉव मे सिर्फ़ मेरे दादा दादी ही बचे थे जो गॉव मे हम लोगों की ज़मीन जायदाद का ख्याल रखते थे । मेरे पिता ऐक होटल मे कार्य करते थे और हम लोग ऐक छोटे से मकान मे ऐक साथ रहते थे । शुरूवात के दिनों मे हम लोग साथ रहते थे लेकिन चाचा की ऐक मैनुफ़ैक्चरिंग कंपनी मे नौकरी लगने के बाद दोनों परिवार अलग अलग रहने लगे । मेरे पिता बेहद मेहनती व्यक्ति थे और पॉच – छ साल के अन्दर ही हम लोग अंधेरी में ऐक फ़्लैट में शिफ़्ट हो गये ।

मेरे पिता का नाम बलबीर सिहं था और प्यार से उन्हें बॉबी कहते थे । मेरी मॉ शकुन्तला घरेलू महिला थी जो पूजा पाठ इत्यादि में लीन रहती थी । मेरी बहन कंचन मुझसे तीन साल छोटी है ।

मेरे चाचा सतबीर सिंह मार्केटिंग मैनेजर थे और धीरे धीरे उन्होंने अच्छी तरक़्क़ी कर ली थी । हमारे दोनों परिवार आस पास ही रहते थे और प्रत्येक दिन ऐक दुसरे के यहॉ जाना लगा रहता था । मेरा चचेरा भाई मयंक है जो मुझसे ऐक साल छोटा है लेकिन हम लोग ऐक साथ ही स्कूल में भर्ती हुये थे तो हम भाई होने के साथ साथ अच्छे दोस्त भी थे । मेरी चचेरी बहन जान्वही है जो मुझसे छ साल छोटी है ।

शुरूवात के सालों में हम लोग प्रत्येक वर्ष ऐक बार तो गॉव जाते थे और गर्मियों की छुट्टियों में कम से कम ऐक महिना ज़रूर बिताते थे । मेरे दादा जयसिहं और दादी शारदा देवी हमारे लिये तरह तरह के पहाड़ी पकवान बनाते थे और ढेर सारे फल इत्यादि खाने को देते थे । लेकिन हमारी दसवीं के बाद से चीजें बदलने लगी । बोर्ड के ऐक्जाम थे मेरे पिता ऐवम् चाचा दोनों हमारी पढ़ाई को लेकर बेहद सीरियस थे इसलिये पूरे साल मेरी और मयंक की ट्यूशन लगवाई गयी ताकि हम अच्छा स्कोर कर सके । हम पढ़ने में अच्छे थे और स्कूल के अच्छे बच्चों में हमारी गिनती होती थी । मैं गणित में बेहद लोकप्रिय था और मैंने मैथ्स ओलम्पीयाड में ब्रॉन्ज़ मेडल भी लिया था । मेरे पिता को मुझसे बेहद उम्मीद थी और मैं भी आदर्श बेटा होने के नाते उन्हें निराश नहीं करना चाहता था । मैंने बहुत मेहनत की और बोर्ड में 91% अंक प्राप्त किये । मंयक के भी 87% अकं आये तब पहली बार चाचा को निराश देखा की मंयक के मुझसे कम नम्बर आये है ।

ख़ैर मैं और मंयक ना सिर्फ़ भाई थे लेकिन भाईयों के भी भाई थे । कहीं भी कोई बात हो जाये हम ऐक दुसरे का साथ कभी नहीं छोड़ते थे । कोई भी बात छुपानी हो या कभी भी ऐक दुसरे का साथ देना हो हम कभी पीछे नहीं हटते थे ।

उस साल गॉव नहीं जा पाये । रिज़ल्ट के बाद से ही घर वाले डिस्कशन में लगे रहते कि हमें कौन सा स्कूल और कौन सा कोर्स करवाना है । छुट्टियों के दिनों में हमारी अंग्रेज़ी की ट्यूशन लगवाई गयी ताकि हम लोगों के कम्यूनिकेशन स्किल अच्छे हो जाये । तीन महीने तक अंग्रेज़ी सीखी और पता भी नहीं चला कब टाइम निकल गया । सुबह हम लोग क्रिकेट एकेडमी जाते और शाम को ट्यूशन । यही रूटीन था वक़्त कैसे निकल गया पता ही नहीं चला । दादा दादी से फ़ोन पे बात होती थी । वो लोग बहुत मिस करते थे । कई बार दादी इमोशनल होकर कहती थी कि मरने से पहले ऐक बार देखना चाहती हूँ तो बहुत बुरा लगता था । मैंने पिता जी को कहा था की दादा दादी को मुंबई बुला लो लेकिन वो मुंबई नहीं आना चाहते थे वो कहते थे कि वो अपना बुढ़ापा पहाड़ों में काटना चाहते है ।

दादाजी फ़ौज से रिटायर्ड थे उन्हे पैंशन मिलती थी तो घर का खर्चा आराम से चल जाता था । लेकिन बुढ़ापे की वजह से वो ज़्यादा काम नहीं कर पाते थे । मुझसे कहते रहते थे की ज़मीन बंजर होते जा रही है इसका उन्हें बेहद दुख है ।

फिर बस फ़ोन में बातचीत होती रहती थी । मुझे कॉमर्स में ऐडमिशन लेना था और मंयक को साइंस में । हमारे मार्क्स अच्छे थे तो दोनों को ऐडमिश्न मिल गया ।

परिवार बेहद खुश था । हमने सबने मिलकर ऐक पार्टी रखी थी जिसमें हम लोगों ने खूब डॉन्स किया । वो दिन भी खुबसूरत दिन थे जिसमें मॉ बाप बस हमारे पास होने पर गर्व करते थे ।

अगले साल ग्याहरवीं के ऐग्जाम के बाद हम लोग गॉव गये । दो सालों में कितना कुछ बदल गया । दादा और दादी ऐक दम बूढ़े लगने लगे थे । सफ़ेद बाल और झुर्रियों वाला चेहरा , चलने में लड़खड़ाहट और बोलने में रूकावट । ऐकदफा मैं हैरान हो गया कि क्या यही वो दादा दादी है जो बचपन में मुझे उठा उठा के घुमाते थे लेकिन आज चल भी नहीं पा रहे । मैं इंमोशनल हो गया और अंदर ही अंदर मुझे बुरा लग रहा था । दादा जी ऐक दिन शाम को मुझे और मंयक को साथ ले गये और हमारी ज़मीन जायदाद दिखाने लगे । दादा जी कह रहे थे की यदि तुम लोग इतनी ज़मीन में मेहनत करोगे तो तुम्हें कहीं भागने की ज़रूरत नहीं । लेकिन खेती में कुछ रहा नहीं आजकल , लोग खेती को बढ़ावा नहीं देते है और इससे दूर भागते है । तुम लोग ऐसा मत करना और अपने पूर्वजों की विरासत को खो मत देना । उस दादा ने रात को अपने दादा की कहानी सुनाई ।

कहानी गडरियों की जो साल भर अपनी भैड़ बकरियों और भैंसों के झुण्डों के साथ रहते थे । दादाजी कहते थे की उनके दादा धनसिंह इलाक़े के सबसे बड़े गडरियों में से ऐक थे । दादा कहते थे कि उनके भी दादा ने हिमालय बहुत सी यात्रायें की थी । कई दफ़ा उनका पाला हिमालय में रहने वाली कई प्रकार की जनजातियों से हुआ था जो तंत्र मंत्र व जादू टोना से इंसान को बकरी बना सकते थे । वे जातियाँ आज भी हिमालय के कई इलाक़ों में मौजूद है । ये कहानियाँ बेहद रोमांचक होती थी । दादा कहते ऐक वक़्त उनके दादा के पास 2000 भैड़ बकरियाँ थी और उनका परिवार इलाक़े के सबसे रसूखदार ख़ानदानों में ऐक था । लेकिन ज़माना बदलता गया और व्यावसायिक दृष्टिकोण भी बदल गया । अब लोग पढ़ लिखकर टैकनिकल होते जा रहे है और अपनी विरासत को भूलते जा रहे है । दादा जी चाहते थे मैं और मंयक अपनी विरासत को ज़िन्दा रखे लेकिन आज के दौर में यह संभव नहीं था । उन्हें भी पता था कि वो हमें अपने पास रखना चाहते थे लेकिन गॉव लगभग विरान ही हो चुके थे और लोग सिर्फ़ छुट्टियों के समय ही दिखाई देते थे । वहॉ ना अच्छी रोड थी , ना अस्पताल था और न ही अच्छे स्कूल थे ।

ख़ैर छुट्टियाँ ख़त्म होने के बाद हम लोग गॉव से निकल रहे थे । दादा ने मुझे और मंयक को हज़ार- हज़ार रूपये दिये जिसके बारे में हमने घर में कभी भी ज़िक्र नहीं किया और उसके खूब मज़े किये । हम लोग मोहल्ले में क्रिकेट टीम बनाते थे जिसमें पचास – पचास रूपये का मैच चलता था । मेरी और मंयक की टीम होती थी और हम हमेशा जीतते थे । पचास रूपये जितने से ऐसा लगता था जैसे हम किसी रईसज़ादे से कम नहीं । फिर उसके बाद फिर से बोर्ड ऐग्जाम आने को थे । इसी बीच दादा और दादी की तबीयत ख़राब हो गयी । गॉव से बुलावा आया । मेरे पिता और चाचा दोनों गॉव चले गये लेकिन हम लोग नहीं जा पाये क्योंकि बोर्ड ऐग्जाम थे । मैं उनसे आख़िरी बार मिलना चाहता था । लगभग एक माह तक दोनों अस्पताल में रहे । पहले दादी की मृत्यु हो गयी और फिर ऐक हफ़्ते के बाद दादा की मृत्यु हो गयी । यह बिल्कुल सपने की तरह लगता है । दोनों अब हमारे साथ नहीं है मैं सोलह साल का था और मंयक पन्द्रह साल का । दादा कहते थे

“सागर और मंयक , खूब मेहनत करना और तरक़्क़ी करना । अपने पूर्वजों को याद करना और उनकी विरासत को जिन्दा रखना । हमें मालूम है तुम अच्छा काम करोगे और हमारे बाप दादाओं के बाप दादा स्वर्ग के द्वार से देख रहे होगें । उन्हें भी तुम पर गर्व होगा ।हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है ।”

जैसे ही मालूम पड़ा कि दादा दादी नहीं रहे , यह मालूम नही था कि कैसा अनुभव है बस रोना आ रहा था । मैंने उस रात खाना नहीं खाया । मंयक भी मेरे साथ था । कंचन भी भूखी सो गयी और जान्वही भी ।

उस दिन चीख चीख कर कहने का मन था । दादी मॉ और दादा जी हम आपसे बेहद मोहब्बत करते हैं लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि अन्तिम समय में हम आपके साथ नहीं थे । कुछ दिन के बाद फिर से सब चीज़ें सामान्य हो गयी । हम लोग बोर्ड ऐग्जाम की तैय्यारियॉ करने लगे ।

बोर्ड ऐग्जाम अच्छे हो गये रिज़ल्ट भी शानदार आया था । ऐग्जाम के बाद ही हम लोगों की कोचिगं स्टार्ट हो गयी थी । अब कॉम्पिटशन की तैयारी थी । मयंक इंजीनीयरिंग के लिये और मुझे कॉमर्स /बी०बी०ऐ के लिये तैयारी करनी थी । मैंने मुंम्बई यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी के लिये ऐप्लाई किया था और मयंक ने भी चार पॉच ऐग्जाम दिये थे । अब घरवाले को आगे की चिंता थी कि कौन सा कॉलेज मिलेगा और कौन सा कोर्स करेगे । मयंक को नामी इंजीनियरिंग कॉलेज मे कम्प्यूटर साइंस में ऐडमिशन मिल गया । मेरा रिटन ऐग्जाम अच्छा हुआ था बस रिज्लट आना बाकि था । मेरे पिता चाहते थे कि मैं सैंट जेविर्स कॉलेज (St Xavier’s College) में भर्ती हो जाऊँ लेकिन वह रिज़ल्ट पर निर्भर करता । कुछ दिन बाद रिज़ल्ट आ गया और मुझे बी० बी० ऐ० (BBA) के लिये सेंट जेविर्स कॉलेज मिल गया ।

By The Lost Monk

Writer || Poet || Explorer || Photographer || Engineer || Corporate Investigator || Motivator

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